हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार: आधुनिक हिमाचल की नींव रखने वाले युगदृष्टा — आशीष कुमार

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जब भी हिमाचल प्रदेश के निर्माण और विकास की चर्चा होगी, सबसे पहला नाम डॉ. यशवंत सिंह परमार का लिया जाएगा। उन्हें केवल हिमाचल प्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री कहना उनके व्यक्तित्व और योगदान को सीमित कर देना होगा। वे उस विचार के जनक थे जिसने बिखरे हुए पहाड़ी क्षेत्रों को एक सशक्त, आत्मसम्मानी और विकासोन्मुख राज्य के रूप में स्थापित किया। आधुनिक हिमाचल जिस मजबूत नींव पर आज खड़ा है, उस नींव का प्रत्येक आधार-स्तंभ डॉ. परमार की दूरदर्शिता, संघर्ष और विकास-दृष्टि का परिणाम है। इसलिए उन्हें "हिमाचल निर्माता" कहा जाता है। 4 अगस्त केवल एक महान नेता की जयंती नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति के विचारों को याद करने का अवसर है जिसने सत्ता को साधन माना, लक्ष्य नहीं। जिसने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया और जिसने हिमाचल के विकास की शुरुआत गांव, किसान और पंचायत से की। डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म सिरमौर जिले के चनहालग क्षेत्र की लाना बाका पंचायत में हुआ। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े डॉ. परमार ने बचपन से ही ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को देखा और समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीति और विकास की ...

किसानों के मुददे लेकर 20 मार्च को विधानसभा कूच करेंगे जिला सिरमौर के किसान


 किसानों के मुददे लेकर 20 मार्च को विधानसभा कूच करेगी किसान सभा




राजगढ़ : गरीब किसानों की भूमि को बचाने के लिए हिमाचल किसान सभा आगामी 20 मार्च को प्रदेश भर में जिला व खंड स्तर से हजारों की तादाद में सरकार के समक्ष रखने के लिए विधान सभा के लिए कूच करेंगे। हिप्र किसान सभा के राज्य उपाध्यक्ष राजेंदर सिंह और जिला अध्यक्ष सिरमौर  सतपाल मान, राजगढ़ ब्लॉक के  सचिव  नैन सिंह , सतपाल  ने आज राजगढ़ क्षेत्र में किसानों की बैठके कर  क्षेत्र के लोगों को   आहवाहन  किया  20 मार्च को  विधानसभा में जिला सिरमौर से सेंकड़ों लोग  शिमला विशाल रैली  में जमीन से जुड़े मुद्दे विशेष रूप से - शामलात , खुदरा-ओ-दरखतान, मलकियत सरकार, चकोतेदार, नौतोड़ के नियमितीकरण, जनजातीय क्षेत्रों में वन अधिकार कानून का सही ढंग से लागू न होना, विस्थापिता गद्दी, गुजरों इत्यादि सहित मुद्दे भी उठाए जाएंगे। उन्होने बताया कि हिमाचल में आम किसान के पास खेती योग्य जमीन केवल दो से चार बीघा ही रह गयी है। प्रदेश में केवल 06 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि में से एक लाख हैक्टेयर भूमि विभिन्न जल परियोजनाओं में डूब गई । शेष पांच लाख हैक्टेयर भूमि पर 10 लाख 57 लाख किसान खेती करते हैं। लाखों की तादाद में शिक्षित नौजवानों के लिए सरकारी नौकरियां बहुत कम रह गयी हैं। - हिमाचल के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों को छोडकर कहीं उद्योग नहीं हैं जहां युवाओं को रोजगार का


विकल्प मिल सके। उन्होने बताया कि प्रदेश में बेदखली की मुहिम किसानों के लिए नासूर का काम कर रही है। इनका कहना है कि पिछली प्रदेश सरकारों ने 2000, 2002, 2015 और 2018 में लघु और सीमांत किसानों के कब्जे वाली कृषि, बागवानी और मकान बनाने के लिए इस्तेमाल की गई भूमि के नियमितीकरण के प्रयास किए परन्तु केंद्रीय सरकार से इसकी अनुमति नहीं मिली। हिमाचल में ये विशेष परिस्थितियाँ हिमाचल सरकार की 1952 की अधिसूचना, 1980 का वन संरक्षण कानून, 1988 की राष्ट्रीय वन नीतिय 12 दिसंबर 1996 को सर्वोच्च न्यायलय के गोदावर्मन केस मामले में सभी राज्यों को जारी निर्देश 2006 के वन अधिकार कानून के कारण उत्पन्न हुई हैं। दूसरा ओर हिमाचल में हो रहे ढांचागत विकास के तहत किसानों की भूमि और सरकारी भूमि का अधिग्रहण हो रहा है।

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