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Showing posts from December, 2022

मजदूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा: श्रम, करुणा और न्याय का प्रश्न* :---- आशीष कुमार

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 *मजदूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा: श्रम, करुणा और न्याय का प्रश्न* :---- आशीष कुमार आशी आज एक ओर पूरी दुनिया मजदूर दिवस मना रही है, तो दूसरी ओर बुद्ध पूर्णिमा भी है। यह संयोग केवल कैलेंडर का नहीं, बल्कि विचारों का है—श्रम और करुणा, न्याय और मानव गरिमा के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है । मजदूर दिवस हमें उन हाथों की संघर्षों की  याद दिलाता है, जिन्होंने दुनिया को गढ़ा है। बुद्ध पूर्णिमा हमें उस चेतना की याद दिलाती है, जिसने मनुष्य को दुःख, असमानता और शोषण के कारणों को समझने और उनसे मुक्ति की दिशा दिखाई। मजदूर दिवस का ऐतिहासिक आधार भारत में पहली बार 1 मई 1923 को मजदूर दिवस मनाया गया था। इसके पीछे पूरी दुनिया में हुए मजदूर आंदोलनों की लंबी श्रृंखला थी, जिसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 1886 का शिकागो आंदोलन रहा, जहाँ 8 घंटे काम के अधिकार के लिए मजदूरों ने संघर्ष किया और अपने जीवन तक बलिदान कर दिए। यह इतिहास बताता है कि श्रम अधिकार कभी दया से नहीं मिले, बल्कि संघर्ष और संगठित शक्ति से प्राप्त हुए हैं। परन्तु  आज का सवाल भी यही है  क्या मजदूर की स्थिति बदली है?  लगभग एक सदी के...

अवसर की समानता और बाबा साहब का सपना*

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आशीष कुमार  राज्य सह संयोजक दलित शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश एवम केंद्रीय कमेटी सदस्य दलित शोषण मुक्ति मंच आज  बाबा साहब का 67 वां महापरनिर्वाण दिन   है। आज के दिन खास कर इस बार हर दल अम्बेडकर जी के सपनो का भारत बनाने की बात करंगे और बेशुमार वायदे भी करेंगे, और उनके विचारों  पर चलने की अपील भी करेंगे ,ऐसा लाजमी भी है, परन्तु आज  देश में   लोकतंत्र की हत्या का दौर चला है  ,और मौजूदा व्यवस्था में  संविधान  बचाने के लिए हम मौजूदा सरकार से सवाल भी खड़े करने की हिम्मत नही कर पा रहे है। आज के दिन  वो लोग भी अम्बेडकर महापरिनिर्वाण की  जयंती पर माला अर्पण करते है जिनको इस देश के संविधान से कोई खास लगाव नही है ,  अपितु वह लोग हर जगह संविधान की धज्जियां उड़ाते रहते है।  जाने अनजाने हम किसी न किसी रूप में  उन लोंगो को ही  बढ़ावा दे रहे है जो कि अम्बेडकर जी के विचारों से कोई वास्ता नही रखते है या ऐसा कह सकते है  बाबा साहब की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है, आज  विचारों की क्या विषमताएं है  कुछ  मह...