दीयों की रोशनी में दिखाई देते अंधेरे — आशीष कुमार ‘आशी’

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 दीयों की रोशनी में दिखाई देते अंधेरे — आशीष कुमार ‘आशी’ सेवा संकल्प और विकास के प्रतीक के रूप में 17 सितम्बर  प्रधानमंत्री के जन्मदिवस पर देशभर में दीये जलाए गए। हर जगह  रोशनी हुई, उत्सव हुआ, तस्वीरें खिंचीं और इसे सेवा, संकल्प और विकास का प्रतीक बताया गया। लेकिन कभी-कभी बहुत ज्यादा रोशनी भी उन सवालों को और साफ कर देती है, जिन्हें हम अंधेरे में छिपा देना चाहते हैं। सत्ता के उत्सव और जनता की जिंदगी के बीच का यह फासला जितना चमकदार बनाया जाता है, उतना ही तीखा दिखाई देता है।  2014 से और आज तक बहुत कुछ बदला है , या फिर ऐसा दर्शाने की कोशिश हुई है की देश की शुरुवात सही मायने में 2014 में हुई  और धीरे धीरे शायद यदि जनता की  आँखे ऐसे ही इन  दियों से चोंधियाती रही तो शायद ये भी सम्भव है की 17 सितम्बर 1950 में गुजरात के  वडनगर में मोदी जी का जन्म हुआ शायद उसे चार धामों की तरह पाँचवे धाम में ना बताना शुरु कर दे,  परन्तु  आज उन्हीं दीयों की लौ को देखते हुए एक मजदूर पूछ रहा है—मेरी मेहनत की न्यूनतम कीमत आखिर कब तय होगी? काम के सही दाम , समान काम का ...

हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार: आधुनिक हिमाचल की नींव रखने वाले युगदृष्टा — आशीष कुमार


जब भी हिमाचल प्रदेश के निर्माण और विकास की चर्चा होगी, सबसे पहला नाम डॉ. यशवंत सिंह परमार का लिया जाएगा। उन्हें केवल हिमाचल प्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री कहना उनके व्यक्तित्व और योगदान को सीमित कर देना होगा। वे उस विचार के जनक थे जिसने बिखरे हुए पहाड़ी क्षेत्रों को एक सशक्त, आत्मसम्मानी और विकासोन्मुख राज्य के रूप में स्थापित किया। आधुनिक हिमाचल जिस मजबूत नींव पर आज खड़ा है, उस नींव का प्रत्येक आधार-स्तंभ डॉ. परमार की दूरदर्शिता, संघर्ष और विकास-दृष्टि का परिणाम है। इसलिए उन्हें "हिमाचल निर्माता" कहा जाता है।

4 अगस्त केवल एक महान नेता की जयंती नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति के विचारों को याद करने का अवसर है जिसने सत्ता को साधन माना, लक्ष्य नहीं। जिसने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया और जिसने हिमाचल के विकास की शुरुआत गांव, किसान और पंचायत से की।

डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म सिरमौर जिले के चनहालग क्षेत्र की लाना बाका पंचायत में हुआ। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े डॉ. परमार ने बचपन से ही ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को देखा और समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीति और विकास की सोच का आधार बना। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानून और प्रशासन का गहन अध्ययन किया। वे विद्वान थे, परंतु उन्हें अहंकार नहीं था। वे बड़े पद पर रहे, लेकिन उनका व्यवहार हमेशा एक सामान्य ग्रामीण की तरह सहज और आत्मीय रहा।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हिमाचल को केवल नक्शे पर बने एक राज्य के रूप में नहीं देखते थे। वे इसे एक सांस्कृतिक, भौगोलिक और सामाजिक इकाई मानते थे जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान है। उस समय जब पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता था, तब डॉ. परमार ने पृथक पहाड़ी राज्य की अवधारणा को मजबूती से रखा। उन्होंने वर्षों तक संघर्ष किया और अंततः हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य बनने का मार्ग प्रशस्त किया। यह केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान की जीत थी।

डॉ. परमार का विकास मॉडल अपने समय से काफी आगे था। उनका मानना था कि हिमाचल का भविष्य बड़े उद्योगों से अधिक कृषि, बागवानी, जल संसाधनों, शिक्षा और ग्रामीण विकास पर निर्भर करेगा। उन्होंने किसानों और बागवानों को प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना। फलोत्पादन, विशेषकर सेब सहित अन्य बागवानी फसलों को बढ़ावा देने, कृषि के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने, ग्रामीण संपर्क मार्गों का विस्तार करने और सिंचाई सुविधाओं के विकास की दिशा में उनकी सोच ने हिमाचल की अर्थव्यवस्था को नई पहचान दी। आज बागवानी हिमाचल की आर्थिक शक्ति है तो उसकी बुनियादी नीति में डॉ. परमार की दूरदृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।

उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं को लोकतंत्र की असली ताकत माना। उनका विश्वास था कि विकास सचिवालयों में बैठकर नहीं, बल्कि गांवों में जनता की भागीदारी से होता है। इसलिए उन्होंने पंचायतों को मजबूत बनाने, ग्रामीण नेतृत्व को आगे लाने और विकेंद्रीकरण की अवधारणा को प्रोत्साहित किया। आज यदि हिमाचल में पंचायत व्यवस्था अपेक्षाकृत सशक्त दिखाई देती है तो उसके पीछे डॉ. परमार की सोच की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। उनका मानना था कि पहाड़ का भविष्य स्कूलों और कॉलेजों से तय होगा। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों तक शिक्षा पहुँचाने, विद्यालयों के विस्तार और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाने पर बल दिया। स्वास्थ्य सेवाओं का ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार, सड़कों का निर्माण और प्रशासन को गांवों तक पहुँचाना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल था।

डॉ. परमार का व्यक्तित्व जितना विराट था, उनका जीवन उतना ही सादा था। वे किसानों के बीच सहज बैठते थे, गांवों में बिना औपचारिकता के लोगों से मिलते थे और जनता की बात सीधे सुनते थे। उनमें सत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि सेवा का संस्कार था। यही कारण है कि आज भी उन्हें केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जननेता के रूप में याद किया जाता है।

डॉ. परमार का सार्वजनिक जीवन केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि सादगी, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों से भी परिभाषित होता है। लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने कभी सत्ता का निजी लाभ नहीं उठाया। उनके जीवन के अनेक प्रेरक प्रसंग आज भी लोगों के लिए आदर्श हैं। कहा जाता है कि 2 मई 1981 को उनके निधन के समय उनके बैंक खाते में मात्र 563 रुपये थे। 24 जनवरी 1977 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने तत्काल सरकारी गाड़ी और सरकारी आवास छोड़ दिया तथा अपना सामान स्वयं उठाकर साधारण यात्री की तरह एचआरटीसी की बस से अपने पैतृक गांव लौट गए। न्यायिक सेवा के दौरान भी जब उनके निर्णय में हस्तक्षेप का प्रयास किया गया तो उन्होंने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय पद छोड़ना उचित समझा और बाद में प्रजामंडल आंदोलन के माध्यम से जनता के अधिकारों की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई।

उनका मानना था कि "सड़क पहाड़ की भाग्य रेखा है।" वे अच्छी तरह समझते थे कि सड़कें केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार और समग्र विकास का आधार होती हैं। हिमाचल के एकीकरण के लिए सुकेत सत्याग्रह सहित विभिन्न जनआंदोलनों में उनका संघर्ष भी उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रमाण है।

उनके सादगीपूर्ण जीवन का एक और मार्मिक प्रसंग अक्सर याद किया जाता है। वर्ष 1961 में उनके पुत्र लव परमार ने कॉलेज की क्रिकेट टीम के लिए क्रिकेट बूट और एक अतिरिक्त बिस्तर की आवश्यकता बताई थी, लेकिन आर्थिक अभाव के कारण डॉ. परमार ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए अपना पुराना बिस्तर ही भेज दिया। यह प्रसंग बताता है कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में रहते हुए कभी निजी संपत्ति या वैभव अर्जित करने का प्रयास नहीं किया।

आज जब हिमाचल अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रहा है—युवाओं में बेरोजगारी, कृषि और बागवानी की बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, प्राकृतिक आपदाएँ, ग्रामीण पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रश्न—तब डॉ. परमार की विकास-दृष्टि पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। उनका मॉडल संतुलित विकास का मॉडल था, जिसमें प्रकृति, किसान, गांव और सामाजिक न्याय सभी समान रूप से महत्वपूर्ण थे।

यह भी एक विडंबना है कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों से डॉ. परमार ने अपने सार्वजनिक जीवन की प्रेरणा ली और जिन्होंने उन्हें हिमाचल को दिशा देने वाला नेतृत्व दिया, वे क्षेत्र आज भी अनेक बुनियादी समस्याओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके हैं। यह केवल एक क्षेत्र का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल के ग्रामीण विकास पर गंभीरता से विचार करने का विषय है। यदि हम वास्तव में डॉ. परमार को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश का कोई भी गांव शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन, सिंचाई और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित न रहे।

डॉ. यशवंत सिंह परमार की विरासत हमें बताती है कि किसी प्रदेश का निर्माण केवल भवनों, योजनाओं और घोषणाओं से नहीं होता; उसका निर्माण दूरदर्शी नेतृत्व, ईमानदार राजनीति, जनभागीदारी और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की प्रतिबद्धता से होता है।

4 अगस्त को जब पूरा हिमाचल अपने निर्माता को नमन करेगा, तब सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके सपनों के हिमाचल को आगे बढ़ाने का संकल्प लें—एक ऐसा हिमाचल जो समृद्ध हो, आत्मनिर्भर हो, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो और जहां विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यही डॉ. यशवंत सिंह परमार के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

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