बराबरी का अधूरा सफ़र”
आज कुछ खेत-खलिहान भी मेरे हैं, पानी का एक छोटा सा कुआँ भी अपने नाम लिए बैठा हूँ। अपने ही घर के समारोह में अलग थाली, अलग धाम है मेरे, देखो मैं कैसा ये हिंदुस्तान लिए बैठा हूँ। खेतों में उगा सकता हूँ सबके लिए अन्न मगर, अब भी छुआछूत का फरमान लिए बैठा हूँ। कहते हो बदल गया है दौर इस मुल्क का, मैं सदियों का मगर ज़ख़्मी इतिहास लिए बैठा हूँ। तुम्हारी सभाओं में बराबरी के नारे गूंजते हैं, मैं अपने हिस्से का अब भी अपमान लिए बैठा हूँ। याद है मुझे रोहित वेमुला का टूटा हुआ सपना, हर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर सवाल लिए बैठा हूँ। पायल तड़वी की वो खामोश चीख भी याद है, अस्पतालों के गलियारों में इंसाफ़ की आस लिए बैठा हूँ। दर्शन सोलंकी की बुझती उम्मीदों में भी हर कैंपस में बराबरी की मशाल लिए बैठा हूँ। याद है हाथरस की वो सुलगती हुई रात, हर दलित बेटी की चीख का सवाल लिए बैठा हूँ। हर रोज़ कहीं न कहीं दलित औरत की इज़्ज़त लूटी जाती है, उनके आँसुओं का हिसाब लिए बैठा हूँ। थोड़ा सा हक़ मिला तो हंगामा मचा दिया सबने, जैसे मैं पूरे जहाँ का अधिकार लिए बैठा हूँ। घर बनाता हूँ सबके लिए, खुद ही बेघर बना हुआ बैठा ...