108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता
“भारी बारिश में बैठे जीवन रक्षक: सरकार ने कि सके आगे घुटने टेक दिए?” 108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता अब फैसला सरकार को करना है—वह जनता के साथ खड़ी होगी या कंपनियों के साथ? आशीष कुमार सीटू हिमाचल प्रदेश __________________________________________ भारी बारिश में भीगते हुए, सड़क पर डटे ये लोग कोई आम प्रदर्शनकारी नहीं हैं—ये वही जीवन रक्षक हैं, जिनके भरोसे हर दिन अनगिनत जिंदगियां अस्पताल तक पहुंचती हैं। आज वही हाथ, जो दूसरों की जान बचाते हैं, अपने ही रोजगार और अधिकार बचाने के लिए सड़कों पर बैठे हैं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में 120 घंटे का दिन-रात महापड़ाव जारी है। 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल वेतन या सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई है। सबसे बड़ा सवाल आज सरकार से है—आखिर ऐसा क्या है कि उसने एक निजी कंपनी के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्यों उन कर्मचारिय...