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अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार* — आशीष कुमार

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*अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार* — आशीष कुमार _____________________________ भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर को अक्सर “संविधान के जनक” के रूप में याद किया जाता है। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल शब्द न होकर जीवन का आधार बनें। लेकिन आज के दौर में अंबेडकर को समझना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है, क्योंकि जिन मूल्यों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वही आज चुनौती के घेरे में हैं। हर साल 14 अप्रैल को मनाई जाने वाली अम्बेडकर जयंती केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि का दिन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है। वर्ष 2026 में हम अंबेडकर की 135वीं जयंती मना रहे हैं,यह केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान संघर्षों से जोड़ने का महत्वपूर्ण क्षण है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि अंबेडकर के विचारों को सिर्फ माल्यार्पण तक सीमित करना, उनके संघर्ष की भावना के साथ अन्याय है। असली श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम उनके बताए रास्ते पर चलकर सामाजिक ब...

108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता

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 “भारी बारिश में बैठे जीवन रक्षक: सरकार ने कि सके आगे घुटने टेक दिए?” 108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता अब फैसला सरकार को करना है—वह जनता के साथ खड़ी होगी या कंपनियों के साथ?                                आशीष कुमार सीटू हिमाचल प्रदेश  __________________________________________ भारी बारिश में भीगते हुए, सड़क पर डटे ये लोग कोई आम प्रदर्शनकारी नहीं हैं—ये वही जीवन रक्षक हैं, जिनके भरोसे हर दिन अनगिनत जिंदगियां अस्पताल तक पहुंचती हैं। आज वही हाथ, जो दूसरों की जान बचाते हैं, अपने ही रोजगार और अधिकार बचाने के लिए सड़कों पर बैठे हैं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में 120 घंटे का दिन-रात महापड़ाव जारी है। 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल वेतन या सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई है। सबसे बड़ा सवाल आज सरकार से है—आखिर ऐसा क्या है कि उसने एक निजी कंपनी के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्यों उन कर्मचारिय...

धर्म नहीं, सामाजिक न्याय आधार—आरक्षण पर फैसले पर पुनर्विचार जरूरी*

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 *धर्म नहीं, सामाजिक न्याय आधार—आरक्षण पर फैसले पर पुनर्विचार जरूरी* शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश के राज्य संयोजक आशीष कुमार तथा सह संयोजक राजेश कोष और मिन्ता जिंटा ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जाएगा। उन्होंने कहा कि आरक्षण का सवाल किसी धर्म से नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण से जुड़ा हुआ है। शोषण मुक्ति मंच ये  स्पष्ट रूप से मानता है कि समाज में मौजूद वर्गीय और जातिगत असमानताओं को खत्म किए बिना वास्तविक बराबरी संभव नहीं है। नेताओं ने कहा कि धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और उस पर होने वाला भेदभाव खत्म नहीं हो जाता। ऐसे में इस आधार पर आरक्षण से वंचित करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह संविधान में निहित सामाजिक न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ भी है। उन्होंने मांग की कि इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए और इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाए, ताकि शोषित और वंचित वर...

जाति का दर्द नही झेला. इसलिए आरक्षण पर दे रहे है शांता कुमार ज्ञान*:--आशीष कुमार

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 *जाति का दर्द नही झेला. इसलिए  आरक्षण पर दे रहे है शांता कुमार ज्ञान*  *गरीबी नहीं, सामाजिक भेदभाव है असली कारण*           ( आशीष कुमार. राज्य संयोजक शोषण मुक्ति मंच ) शांता कुमार  द्वारा कुछ दिन पूर्व दिये ब्यान में  यह कहना कि देश में आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि केवल गरीबी होना चाहिए, न तो कोई नया तर्क है और न ही यह भारतीय समाज की वास्तविकता को समझने वाला दृष्टिकोण है। सच यह है कि भारत में आरक्षण की व्यवस्था गरीबी दूर करने के लिए नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों की असमानता को दूर करने के लिए बनाई गई थी। भारत का संविधान, जिसे B. R. Ambedkar जैसे महान समाज सुधारकों ने गढ़ा, इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि कुछ जातियों को केवल आर्थिक रूप से नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी दबाया गया। इसलिए आरक्षण सामाजिक न्याय का एक संवैधानिक उपाय है, न कि कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम। अगर आरक्षण को केवल आर्थिक आधार से जोड़ने की बात की जाती है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि EWS आरक्षण पर शांता कुमार जैसे नेता अक्सर खाम...

बराबरी का अधूरा सफ़र”

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 आज कुछ खेत-खलिहान भी मेरे हैं, पानी का एक छोटा सा कुआँ भी अपने नाम लिए बैठा हूँ। अपने ही घर के समारोह में अलग थाली, अलग धाम है मेरे, देखो मैं कैसा ये हिंदुस्तान लिए बैठा हूँ। खेतों में उगा सकता हूँ सबके लिए अन्न मगर, अब भी छुआछूत का फरमान लिए बैठा हूँ। कहते हो बदल गया है दौर इस मुल्क का, मैं सदियों का मगर ज़ख़्मी इतिहास लिए बैठा हूँ। तुम्हारी सभाओं में बराबरी के नारे गूंजते हैं, मैं अपने हिस्से का अब भी अपमान लिए बैठा हूँ। याद है मुझे रोहित वेमुला का टूटा हुआ सपना, हर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर सवाल लिए बैठा हूँ। पायल तड़वी की वो खामोश चीख भी याद है, अस्पतालों के गलियारों में इंसाफ़ की आस लिए बैठा हूँ। दर्शन सोलंकी की बुझती उम्मीदों में भी हर कैंपस में बराबरी की मशाल लिए बैठा हूँ। याद है हाथरस की वो सुलगती हुई रात, हर दलित बेटी की चीख का सवाल लिए बैठा हूँ। हर रोज़ कहीं न कहीं दलित औरत की इज़्ज़त लूटी जाती है, उनके आँसुओं का हिसाब लिए बैठा हूँ। थोड़ा सा हक़ मिला तो हंगामा मचा दिया सबने, जैसे मैं पूरे जहाँ का अधिकार लिए बैठा हूँ। घर बनाता हूँ सबके लिए, खुद ही बेघर बना  हुआ बैठा ...

संजू सैमसन ने रचा इतिहास

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  संजू सैमसन ने रचा इतिहास हालांकि इसके बाद संजू सैमसन को ईशान किशन का साथ मिला और दोनों ने भारतीय टीम को 100 रन के पार पहुंचा दिया। ईशान किशन 18 गेंद में 39 रन बनाकर आउट हुए, जिसमें उन्होंने 2 छक्के और 4 चौके लगाए। दूसरी ओर संजू सैमसन ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए अपना अर्धशतक पूरा किया। वह 42 गेंद में 89 रन बनाकर आउट हुए और यह टी20 वर्ल्ड कप के नॉकआउट मैचों में भारत की ओर से संयुक्त रूप से सबसे बड़ी पारी है। इससे पहले 2016 के सेमीफाइनल में वेस्टइंडीज के खिलाफ विराट कोहली ने नाबाद 89 रन बनाए थे। संजू सैमसन ने अपनी पारी में 7 चौके और 7 छक्के लगाए। सैमसन के आउट होने के बाद शिवम दुबे ने 25 गेंद में ताबड़तोड़ 43 रन ठोक दिए। हालांकि वह दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से रन आउट होकर पवेलियन लौटे। दूसरी ओर सूर्यकुमार यादव एक बार फिर फ्लॉप रहे और 6 गेंद में 11 रन बनाकर आउट हो गए। इसके बाद तिलक वर्मा ने 7 गेंदों में 3 छक्के लगाकर 21 रन की धुंआधार पारी खेली, तो हार्दिक ने 12 गेंदों में 27 रन कूट डाले। इस तरह भारतीय टीम ने 20 ओवर में 7 विकेट गंवाकर 253 रन बनाए।

सामाजिक न्याय की लड़ाई तेज़: 28 फरवरी धर्मशाला रैली में शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश का समर्थन*

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 *सामाजिक न्याय की लड़ाई तेज़: 28 फरवरी धर्मशाला रैली में शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश का समर्थन* ----------------------------------------------- 23 फरवरी को शोषण मुक्ति मंच की राज्य स्तरीय शोषण मुक्ति मंच राज्य कमेटी की वर्चुअल बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें प्रदेश के 11 जिलों से मंच के पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक में मंच के राज्य संयोजक आशीष कुमार, सह संयोजक राजेश कोष, मिंटा ज़िंटा, जगत राम, मीर सुख, बुद्धि राम जस्ता, मंशा राम जी, विवेक कश्यप, नरेंद्र, करमचंद भाटिया, प्रीतिपाल मट्टू, सतपाल मान, रामचंदर, मान सिंह, नैन सिंह, संदीप भारती,सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे। बैठक को संबोधित करते हुए मंच के संयोजक आशीष कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियम सामाजिक न्याय की दिशा में एक आवश्यक कदम हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं और ऐसे में कठोर एवं प्रभावी नियमों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि 2012 के UGC विनियम जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से बनाए गए थे, किंतु बढ़ते मामलों ने यह स्पष्ट किया कि वे पर्याप्...