बराबरी का अधूरा सफ़र”
आज कुछ खेत-खलिहान भी मेरे हैं,
पानी का एक छोटा सा कुआँ भी
अपने नाम लिए बैठा हूँ।
अपने ही घर के समारोह में
अलग थाली, अलग धाम है मेरे,
देखो मैं कैसा ये हिंदुस्तान
लिए बैठा हूँ।
खेतों में उगा सकता हूँ
सबके लिए अन्न मगर,
अब भी छुआछूत का
फरमान लिए बैठा हूँ।
कहते हो बदल गया है
दौर इस मुल्क का,
मैं सदियों का मगर
ज़ख़्मी इतिहास लिए बैठा हूँ।
तुम्हारी सभाओं में
बराबरी के नारे गूंजते हैं,
मैं अपने हिस्से का
अब भी अपमान लिए बैठा हूँ।
याद है मुझे
रोहित वेमुला का टूटा हुआ सपना,
हर यूनिवर्सिटी की दीवारों पर
सवाल लिए बैठा हूँ।
पायल तड़वी की वो
खामोश चीख भी याद है,
अस्पतालों के गलियारों में
इंसाफ़ की आस लिए बैठा हूँ।
दर्शन सोलंकी की
बुझती उम्मीदों में भी
हर कैंपस में बराबरी की
मशाल लिए बैठा हूँ।
याद है हाथरस की
वो सुलगती हुई रात,
हर दलित बेटी की चीख का
सवाल लिए बैठा हूँ।
हर रोज़ कहीं न कहीं
दलित औरत की इज़्ज़त लूटी जाती है,
उनके आँसुओं का
हिसाब लिए बैठा हूँ।
थोड़ा सा हक़ मिला तो
हंगामा मचा दिया सबने,
जैसे मैं पूरे जहाँ का
अधिकार लिए बैठा हूँ।
घर बनाता हूँ सबके लिए,
खुद ही बेघर
बना हुआ बैठा हूँ।
मंदिरों की ऊँची इमारतें
मैंने ही बनाई हैं,
मगर अंदर न जाने का
फरमान लिए बैठा हूँ।
गटर की सफाई का
“विशेषाधिकार” भी मेरा ही है,
देखो कैसा ये समाज का
सम्मान लिए बैठा हूँ।
कुछ चुनावी सीटों का
अधिकार भी मिला है मुझे,
मगर जीत-हार की चाबी
अब भी उनके हाथ दिए बैठा हूँ।
पार्टी में बराबरी के नाम पर
हर पद लिखा है मेरा,
मगर फैसलों में
उनका ही फरमान लिए बैठा हूँ।
ज़रा सा आगे बढ़ने का
मौका क्या मिल गया मुझे,
उन्हें लगता है जैसे
मैं पूरा संसार लिए बैठा हूँ।
संविधान लागू होने के बाद
थोड़ा सा हक़ क्या मिला,
उन्हें लगता है जैसे
मैं दौलत बेहिसाब लिए बैठा हूँ।
सुन लो ऐ जाति के किलों में
बैठे हुक्मरानों,
मैं सिर्फ़ सवाल नहीं—
पूरा संविधान लिए बैठा हूँ।
और याद रखना…
जिस दिन ये आवाज़
सड़क पर उतर आएगी,
वो दिन होगा जब
मैं अपने हिस्से का
पूरा हिंदुस्तान लिए बैठा हूँ।
— आशीष कुमार “आशी”

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