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Showing posts from April, 2026

आँगनवाड़ी कर्मियों की मांगों को लेकर निदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग से वार्ता, कई मांगों पर बनी सहमति*

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 *आँगनवाड़ी कर्मियों की मांगों को लेकर निदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग से वार्ता, कई मांगों पर बनी सहमति* ________________________ शिमला। आँगनवाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स यूनियन की राज्य कमेटी की ओर से 8 जून की हड़ताल के प्रथम चरण के तहत आज महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक के साथ बैठक आयोजित की गई। बैठक में यूनियन की ओर से सीटू के राष्ट्रीय सचिव डॉ. कश्मीर सिंह ठाकुर, आँगनवाड़ी यूनियन की राज्य अध्यक्ष नीलम जसवाल, राज्य महासचिव वीना शर्मा, बिमला, सुषमा, अनुराधा सहित राज्य कमेटी के सात सदस्यों ने भाग लिया। बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए यूनियन की राज्य महासचिव वीना शर्मा ने कहा कि बैठक में आँगनवाड़ी कर्मियों की लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर सकारात्मक चर्चा हुई और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विभाग ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि आँगनवाड़ी कर्मियों को ग्रेच्युटी देने के लिए स्वीकृति हेतु प्रस्ताव भेज दिया गया है। स्वीकृति प्राप्त होते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। इसके अलावा लंबे समय से लंबित सुपरवाइजर भर्ती प्रक्रिया को जल्द शुरू करने का आश्वासन भी विभाग की ओर स...

पंचायती राज संस्थाओं में क्या प्रतिनिधित्व सिर्फ दिखावा है, या फैसले लेने की ताकत सच में बदली है?*”

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 *पंचायती राज संस्थाओं में क्या प्रतिनिधित्व सिर्फ दिखावा है, या फैसले लेने की ताकत सच में बदली है?*” आशीष कुमार आशी ______________________________________________ हिमाचल प्रदेश में देर से ही सही  मगर पंचायती राज चुनाव का बिगुल बज चुका है ,इस प्रक्रिया. को पुरा करने से पहली सबसे बड़ी चुनौती जो होती है.  रोस्टर प्रणाली  जो  की हमारे पंचायती राज अधिनियम् 1994 के तहत तय किया जाता है और यह हमारे संविधान के 73 वें संशोधन के अनुरूप है । इस संशोधन  से   पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य स्पष्ट था दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों और महिलाओं को स्थानीय सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना। कागज़ों पर यह व्यवस्था लोकतंत्र को गहराई देती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई स्थानों पर इसकी प्रभावशीलता सीमित नजर आती है। पंचायतों में सीटें आरक्षित जरूर हैं, पर वास्तविक निर्णय लेने की प्रक्रिया कई बार कुछ सीमित हाथों में सिमटी हुई दिखाई देती है। गांवों में “भाईचारा” और “सहमति” के नाम पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की प्रवृत्ति भी सामने आती है। कई बार उम्...

पंचायती राज को मजबूत करने व जनता के मुद्दों को लेकर जिला परिषद से शहरी निकाय तक हस्तक्षेप करेगी सीपीएम”

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 पंचायती राज को मजबूत करने व जनता के मुद्दों को लेकर जिला परिषद से शहरी निकाय तक हस्तक्षेप करेगी सीपीएम नाहन, दिनांक — आगामी पंचायत एवं शहरी निकाय चुनावों को लेकर आज सीपीएम जिला केंद्र की एक महत्वपूर्ण बैठक नाहन में आयोजित की गई। बैठक में स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियों पर विस्तृत चर्चा की गई और यह निर्णय लिया गया कि पार्टी इन चुनावों में जनता की जमीनी समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हुए सक्रिय हस्तक्षेप करेगी। बैठक में यह भी तय किया गया कि चुनावों के माध्यम से जनविरोधी नीतियों को उजागर किया जाएगा, जिनके कारण आम जनता के जीवन पर लगातार नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। विशेष रूप से ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत संचालित मनरेगा को कमजोर किए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि इससे आने वाले समय में ग्रामीण रोजगार और गांवों के विकास पर गंभीर असर पड़ेगा। बैठक में यह भी सामने आया कि जिले में कृषि, बागवानी और दुग्ध उत्पादन से बड़ी आबादी जुड़ी होने के बावजूद इन क्षेत्रों के विकास के लिए ठोस नीतिगत प्रावधानों का अभाव है। ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवाओं की स्थि...

अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार* — आशीष कुमार

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*अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार* — आशीष कुमार _____________________________ भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर को अक्सर “संविधान के जनक” के रूप में याद किया जाता है। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल शब्द न होकर जीवन का आधार बनें। लेकिन आज के दौर में अंबेडकर को समझना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है, क्योंकि जिन मूल्यों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वही आज चुनौती के घेरे में हैं। हर साल 14 अप्रैल को मनाई जाने वाली अम्बेडकर जयंती केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि का दिन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है। वर्ष 2026 में हम अंबेडकर की 135वीं जयंती मना रहे हैं,यह केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान संघर्षों से जोड़ने का महत्वपूर्ण क्षण है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि अंबेडकर के विचारों को सिर्फ माल्यार्पण तक सीमित करना, उनके संघर्ष की भावना के साथ अन्याय है। असली श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम उनके बताए रास्ते पर चलकर सामाजिक ब...

108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता

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 “भारी बारिश में बैठे जीवन रक्षक: सरकार ने कि सके आगे घुटने टेक दिए?” 108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता अब फैसला सरकार को करना है—वह जनता के साथ खड़ी होगी या कंपनियों के साथ?                                आशीष कुमार सीटू हिमाचल प्रदेश  __________________________________________ भारी बारिश में भीगते हुए, सड़क पर डटे ये लोग कोई आम प्रदर्शनकारी नहीं हैं—ये वही जीवन रक्षक हैं, जिनके भरोसे हर दिन अनगिनत जिंदगियां अस्पताल तक पहुंचती हैं। आज वही हाथ, जो दूसरों की जान बचाते हैं, अपने ही रोजगार और अधिकार बचाने के लिए सड़कों पर बैठे हैं। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में 120 घंटे का दिन-रात महापड़ाव जारी है। 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल वेतन या सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई है। सबसे बड़ा सवाल आज सरकार से है—आखिर ऐसा क्या है कि उसने एक निजी कंपनी के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्यों उन कर्मचारिय...