आँगनवाड़ी कर्मियों की मांगों को लेकर निदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग से वार्ता, कई मांगों पर बनी सहमति*

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 *आँगनवाड़ी कर्मियों की मांगों को लेकर निदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग से वार्ता, कई मांगों पर बनी सहमति* ________________________ शिमला। आँगनवाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स यूनियन की राज्य कमेटी की ओर से 8 जून की हड़ताल के प्रथम चरण के तहत आज महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक के साथ बैठक आयोजित की गई। बैठक में यूनियन की ओर से सीटू के राष्ट्रीय सचिव डॉ. कश्मीर सिंह ठाकुर, आँगनवाड़ी यूनियन की राज्य अध्यक्ष नीलम जसवाल, राज्य महासचिव वीना शर्मा, बिमला, सुषमा, अनुराधा सहित राज्य कमेटी के सात सदस्यों ने भाग लिया। बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए यूनियन की राज्य महासचिव वीना शर्मा ने कहा कि बैठक में आँगनवाड़ी कर्मियों की लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर सकारात्मक चर्चा हुई और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विभाग ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि आँगनवाड़ी कर्मियों को ग्रेच्युटी देने के लिए स्वीकृति हेतु प्रस्ताव भेज दिया गया है। स्वीकृति प्राप्त होते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। इसके अलावा लंबे समय से लंबित सुपरवाइजर भर्ती प्रक्रिया को जल्द शुरू करने का आश्वासन भी विभाग की ओर स...

108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता

 “भारी बारिश में बैठे जीवन रक्षक: सरकार ने कि



सके आगे घुटने टेक दिए?”


108/102 एम्बुलेंस कर्मियों का संघर्ष और व्यवस्था की संवेदनहीनता


अब फैसला सरकार को करना है—वह जनता के साथ खड़ी होगी या कंपनियों के साथ?

                               आशीष कुमार सीटू हिमाचल प्रदेश 

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भारी बारिश में भीगते हुए, सड़क पर डटे ये लोग कोई आम प्रदर्शनकारी नहीं हैं—ये वही जीवन रक्षक हैं, जिनके भरोसे हर दिन अनगिनत जिंदगियां अस्पताल तक पहुंचती हैं। आज वही हाथ, जो दूसरों की जान बचाते हैं, अपने ही रोजगार और अधिकार बचाने के लिए सड़कों पर बैठे हैं।

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में 120 घंटे का दिन-रात महापड़ाव जारी है। 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं से जुड़े कर्मचारी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह केवल वेतन या सुविधा का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और अस्तित्व की लड़ाई है।

सबसे बड़ा सवाल आज सरकार से है—आखिर ऐसा क्या है कि उसने एक निजी कंपनी के आगे घुटने टेक दिए हैं? क्यों उन कर्मचारियों की आवाज नहीं सुनी जा रही, जो दिन-रात जनता की सेवा में लगे रहते हैं?

प्रदेश के हर कोने—कुल्लू, किन्नौर, लाहौल-स्पीति, सिरमौर, चंबा, ऊना, कांगड़ा, सोलन, शिमला और बिलासपुर—से उठती आवाजें एक ही सच्चाई बयान कर रही हैं: यह कोई एक दिन का गुस्सा नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे शोषण का विस्फोट है।

एम्बुलेंस कर्मियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया जा रहा। 12-12 घंटे की ड्यूटी ली जाती है, लेकिन ओवरटाइम का कोई भुगतान नहीं। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं—ईपीएफ और ईएसआई—में अनियमितताएं हैं। छुट्टियां नहीं मिलतीं, और विरोध करने पर नौकरी से निकालने की धमकी दी जाती है।

और सबसे चौंकाने वाली बात—उच्च न्यायालय और श्रम विभाग के आदेशों के बावजूद कोई सुधार नहीं। आखिर क्यों? क्या कानून केवल कागजों तक सीमित हैं?

सच्चाई यह है कि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवा को निजी कंपनियों के हवाले कर दिया गया है। जहां मुनाफा सबसे ऊपर है और इंसान की जान सबसे नीचे। यही वजह है कि कर्मचारियों का शोषण भी जारी है और सरकार भी मूकदर्शक बनी हुई है।

पिछले 15 वर्षों में सरकारें बदलती रहीं—कभी भाजपा, कभी कांग्रेस‌‌ मगर  हालात नहीं बदले। इससे साफ है कि समस्या सरकार बदलने की नहीं, बल्कि नीतियों की है। निजीकरण की इस नीति ने न केवल कर्मचारियों को असुरक्षित किया है, बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य अधिकार को भी खतरे में डाल दिया है।

आज हालात यह हैं कि जो लोग एम्बुलेंस में मरीजों को जीवन देते हैं, वही खुद असुरक्षित, शोषित और अपमानित जीवन जीने को मजबूर हैं।

सीटू का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा कोई व्यापार नहीं, बल्कि जनता का मौलिक अधिकार है। अगर जीवन रक्षक ही सड़कों पर बैठने को मजबूर होंगे, तो यह केवल एक वर्ग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है।

यह संघर्ष सिर्फ एम्बुलेंस कर्मियों का नहीं है—यह हर उस नागरिक की लड़ाई है, जो एक संवेदनशील और जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था चाहता है।

अब फैसला सरकार को करना है—वह जनता के साथ खड़ी होगी या कंपनियों के साथ?

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