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Showing posts from April, 2019

हिमाचल निर्माता डॉ. यशवंत सिंह परमार: आधुनिक हिमाचल की नींव रखने वाले युगदृष्टा — आशीष कुमार

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जब भी हिमाचल प्रदेश के निर्माण और विकास की चर्चा होगी, सबसे पहला नाम डॉ. यशवंत सिंह परमार का लिया जाएगा। उन्हें केवल हिमाचल प्रदेश का प्रथम मुख्यमंत्री कहना उनके व्यक्तित्व और योगदान को सीमित कर देना होगा। वे उस विचार के जनक थे जिसने बिखरे हुए पहाड़ी क्षेत्रों को एक सशक्त, आत्मसम्मानी और विकासोन्मुख राज्य के रूप में स्थापित किया। आधुनिक हिमाचल जिस मजबूत नींव पर आज खड़ा है, उस नींव का प्रत्येक आधार-स्तंभ डॉ. परमार की दूरदर्शिता, संघर्ष और विकास-दृष्टि का परिणाम है। इसलिए उन्हें "हिमाचल निर्माता" कहा जाता है। 4 अगस्त केवल एक महान नेता की जयंती नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति के विचारों को याद करने का अवसर है जिसने सत्ता को साधन माना, लक्ष्य नहीं। जिसने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया और जिसने हिमाचल के विकास की शुरुआत गांव, किसान और पंचायत से की। डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म सिरमौर जिले के चनहालग क्षेत्र की लाना बाका पंचायत में हुआ। पहाड़ की कठिन परिस्थितियों में पले-बढ़े डॉ. परमार ने बचपन से ही ग्रामीण जीवन की चुनौतियों को देखा और समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीति और विकास की ...

शिमला संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे दो फौजियों और एक सब्जी वाले रवि कुमार में अंतर

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शिमला संसदीय क्षेत्र में इस बार दो राष्ट्रीय पार्टीयों से मुख्यता कांग्रेस और भाजपा से 2 फौजी मैदान में है , चुनाव के गलियारों में ये चर्चा जोरों शोरो से है कि इस बार दो फौजी मैदान में है , यँहा तक कि एक प्रत्याशी ने तो अपने आप मे और अपने प्रतिद्वंदी में क्या अंतर है ये भी बताना शुरू कर दिया और समाचारो में और सोशल मीडिया में खूब उछाला  की आखिर  इन दोनों फ़ौजियीं में किस कदर अंतर है, परन्तु साथियो आज में आपको ये बताना चाहता हूँ कि एक सब्जी बेचने वाले रवि कुमार दलित और दो आर्मी से सेवानिवृत्त हो कर आये फौजियों में अंतर क्या है, दोनो फौजियों की वीरता की गाथा तो उनके प्रशंसक आपको प्रचार प्रसार के माध्यम से मिलता रहेगा, सबसे बड़ा अंतर तो ये है कि इन दोनों फौजियों के पास 70 लाख जो चुनाव आयोग ने निर्धारित किया है वो राशि चुनाव लड़ने को होगी, 70 लाख ही क्या हो सकता है कि उनकी ये राशि उनके पास करोड़ों में हो परन्तु एक सब्जी वाला जो चुनाव लड़ रहा है जोकि कोई  राजनेता नही है सिर्फ और सिर्फ दोनो राजनीतिक दलों के खिलाफ जिसके ये प्रत्याशी एक नही दर्जनों दलितों के साथ हुए अत्याचारों के खिल...

आखिर क्यों पूरा नही हो पा रहा है बाबा साहब का सपना:-----आशीष कुमार आशी

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आज जब लोक सभा का चुनाव है इस ही चुनाव के दौरान हम बाबा साहब की 128 वां जन्मदिन मना रहे है। आज के दिन खास कर इस बार हर दल अम्बेडकर जी के सपनो का भारत बनाने की कोशिश करंगे और बेशुमार वायदे भी करेंगे,ऐसा लाजमी भी है, परन्तु चुनाव के इतने शोर शराबे में ये भी लाजमी है कि हम मौजूदा सरकार ने सवाल भी खड़े नही करेंगे, आज के दिन हम उन लोगों को भी अम्बेडकर जयंती में मालार्पण करने बुलाते है जिनको इन देश के संविधान से कोई खास लगाव नही  अपितु वह लोग हर जगह संविधान की धज्जियां उड़ाते रहते है।  जाने अनजाने हम किसी न किसी रूप में  उन लोंगो को ही  बढ़ावा दे रहे है जो कि अम्बेडकर जी के विचारों से कोई वास्ता नही रखते थे या ऐसा कह सकते है  बाबा साहब की विचारधारा से विपरीत थे, मुझे यँहा विचारों की क्या विषमताएं है  कुछ पंक्तियन का जिक्र यँहा करने जा रहा हूँ में यँहा कहते हुए बिल्कुल भी असहज महसूस नही कर रहा हूँ कि मार्क्सवाद में  और वर्ग संघर्ष से देश मे अवसर की समानता पैदा की जा सकती है, अगर हम थोड़ी देर के लिए भगत सिंह और सावरकर के विचारों को देखे तो आप स्वयं समझ  जाएं...

सेना की शहादत देश के लिए होती है न की राजनीतिक दलों के वोट के लिए :--आशीष कुमार आशी

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17 वी लोक सभा के चुनाव अपनी चरम सीमा पर है , सभी राजनीतिक दल किसी न किसी मुद्दों को  ले कर जनता के बीच जा रहे है, सभी राजनीतिक पार्टीयों के लोग अपने घोषणा पत्र के माध्यम से जनता के बीच  जा रहे है, परन्तु अगर देखा जाए तो घोषणा पत्र तो पिछली लोकसभा के चुनाव के दौरान भी था उसमें से कुछ वायदे ऐसे भी थे जिनको तो खुद घोषणा पत्र बनाने वाली पार्टी ने खुद ही जुमला कह दिया । तो फिर घोषणा पत्र का औचित्य क्या रह जाता है, जब बात चुनाव की आती है  तो हम केवल सरकार बनाने के लिए ही वोट नही करते बल्कि लोकतंत्र और इस देश को मजबूत बनाने के लिए वोट करते है, पिछले 5 वर्षों में जो लोकतंत्र की हत्या हुई है वह किसी से छुपी नही है , अगर इन  5 सालों की तुलना की जाए तो लोकतंत्र के जो हाल और सरकारी संस्थाओं का जो हाल पिछले 5 वर्षों में हुआ है ये भी एक प्रकार का अघोषित आपातकाल की तरह रहा है, पिछली सरकार ने हरेक सरकारी तंत्र और उनकी स्वयत्तता को भंग करने के इलावा कोई ऐसा काम नही किया जिससे  ये कहा जा सके  की ये दौर अघोषित आपातकाल का नही था। अभी आप लोग देखे की चुनाव आचार सहिंता का उलंघन ...

छोटे लक्ष्य के लिए बड़े नुकसान की तरफ बढ़ते सरकारी कदम----आशीष कुमार आशी

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पिछले काफी समय से देश के अंदर कुछ न कुछ नया और कुछ अजीब सा प्रतीत होने वाली हरकते हम कह सकते है कि हमारी सरकार द्वारा की जा रही है चाहे वो किसी प्रदेश की हो या फिर केंद्र की,अगर हम 2014 से आज तक देखे तो  आज देश मे सत्तासीन लोगों से  सवाल खड़ा करना या पूछने में डर सा महसूस होता है। सबसे अधिक में ये रोहित वेमुला की हत्या के बाद इन चीज को महसूस कर रहा हूँ , निश्चित रूप से मेरी राय आपकी राय से भिन्न हो सकती है उस विचारों की भिनता का मै इस देश की बेहतरी के लिए सम्मान करता हूँ,ये कोई रोहित की एक घटना नही परन्तु जवाहरलाल विश्वविद्यालय से ले कर गोरी लंकेश कलबुर्गी जैसे लोगो की हत्या इनमे से एक है, अगर हम ये देखे की ये लोग कोन थे तो साफ साफ नजर आता है कि ये कोई पार्टी विशेष के नही बल्कि समाज मे जो हो रहा है उन गलत विचारों का विरोध तर्कों के साथ  करते है, परन्तु अब सवाल ये उठता है कि आखिर जो तर्क के साथ सरकार से और इस गली सड़ी व्यवस्था से सवाल पूछता है उन लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, क्या समाज मे ये हत्या करने वाले असमाजिक तत्व रातों रात पैदा हो जाते है या फिर किसी बड़ी स...