भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

सेना की शहादत देश के लिए होती है न की राजनीतिक दलों के वोट के लिए :--आशीष कुमार आशी

17 वी लोक सभा के चुनाव अपनी चरम सीमा पर है , सभी राजनीतिक दल किसी न किसी मुद्दों को  ले कर जनता के बीच जा रहे है, सभी राजनीतिक पार्टीयों के लोग अपने घोषणा पत्र के माध्यम से जनता के बीच  जा रहे है, परन्तु अगर देखा जाए तो घोषणा पत्र तो पिछली लोकसभा के चुनाव के दौरान भी था उसमें से कुछ वायदे ऐसे भी थे जिनको तो खुद घोषणा पत्र बनाने वाली पार्टी ने खुद ही जुमला कह दिया । तो फिर घोषणा पत्र का औचित्य क्या रह जाता है, जब बात चुनाव की आती है  तो हम केवल सरकार बनाने के लिए ही वोट नही करते बल्कि लोकतंत्र और इस देश को मजबूत बनाने के लिए वोट करते है, पिछले 5 वर्षों में जो लोकतंत्र की हत्या हुई है वह किसी से छुपी नही है , अगर इन  5 सालों की तुलना की जाए तो लोकतंत्र के जो हाल और सरकारी संस्थाओं का जो हाल पिछले 5 वर्षों में हुआ है ये भी एक प्रकार का अघोषित आपातकाल की तरह रहा है, पिछली सरकार ने हरेक सरकारी तंत्र और उनकी स्वयत्तता को भंग करने के इलावा कोई ऐसा काम नही किया जिससे  ये कहा जा सके  की ये दौर अघोषित आपातकाल का नही था। अभी आप लोग देखे की चुनाव आचार सहिंता का उलंघन कितनी दफा हुआ है और किसने कितनी बार किया है अगर इसकी गिनती की जाए तो खुद को विश्व की सबसे बड़ी  पार्टी कहलकने वाली का नाम आएगा,चुनाव आयोग बिल्कुल भी ये ध्यान नही दे रहा है या फिर इसको जान बूझ कर अनदेखा कर रहा है ,चुनाव आचार सहिंता तो क्या  एक राज्यपाल जो खुद को मोदी की सेना बता रहे है, आज भी वो अपने पद पर बने हुए है, क्या हमारे देश के राष्ट्रपति की दृष्टी में
ये मामला नही है, ऐसा करने पर एक बार इतिहास में  हिमाचल के राज्यपाल को इस्तीफा देना पड़ा था, परन्तु आज उन उसूलों और राज्यपाल की पद की गरिमा का कोई महत्व नही है क्योंकि आज आपके पास तानाशाही  रूपी हथियार है झूठा प्रचार करने वाला  बिकाऊ मीडिया है, इतने में ही बात नही रुक जाती अभी तक तो चलो मोदी जी के भगत विधायक मंत्री सेना के नाम पर वोट मांग रहे है थे और आचार संहिता का उलंघन कर रहे थे,परन्तु आज महाराष्ट्र के अंदर प्रधान सेवक का पुलवामा हमले और सुरजिकल स्ट्राइक के नाम पर वोट की अपील करना आदर्श आचार संहिता का उलंघन तो है ही साथ मे निंदनीय भी है कि किस तरह सेना के शहीद जवानों के नाम मार वोट मांगे जा  रहे है, ये वही अर्ध सैनिक बल के लोग है जिनको  यात्रा के लिए  रक्षा मंत्रालय को सूचित करने पर भी हवाई सुविधा नही मिली थी ,और जिन अर्ध सैनिकों की शहादत पर आप वोट मांग रहे है क्या संवैधानिक रूप से उनको शहीद का दर्जा देने का कोई वादा आपके घोषणा पत्र में है या नही , क्योंकि जिनके नाम पर आप वोट मांग रहे है वे लोग अपनी जिंदगी देश के नाम न्यौछावर करके भी शाहीद नही कहलाते और न ही पेंशन की सुविधा पाते और देश का नेता अगर बुखार से भी मृत्यु को प्राप्त हो और मात्र कुछ दिनों के लिए भी विधायक और सांसद बन जाये तो वी भी राजकीय सम्मान और पेंशन का हकदार होता है , मेरा अर्ध सैनिक बल का जवान इस से अछूता रह जाता है।
इसलिए आप सभी राजनीतिक दलों से निवेदन है कि सेना की शहादत देश के लिए होती है नाकि  राजनीतिक दलों के वोट के  लिए।
:---- आशीष कुमार आशी

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