भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी
*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त है*
यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc रेगुलेशन 2026 में कोई कमी नहीं है, इसमें खामियाँ हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था इसकी आवश्यकता इसलिए भी थी क्यूंकि 2012 का रेगुलेशन कारगर साबित नहीं हो रहा था,असली विषय क़ो छूने से पहले हमें यूजीसी क्या है ये समझना होगा ,यूजीसी की स्थापना अधिनियम 1956 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों क़ो मान्यता देना, शैक्षणिक गुणवत्ता सुनिश्चित करना और केंद्र से मिलने वाले अनुदानों का नियमन करना है। मीडिया टीवी चैनलो पर कई चर्चाओं क़ो सुनने के बाद इस विषय पर ये लिखने का प्रयास किया है, भारत में उच्च शिक्षा को लेकर बार-बार यह दावा किया जाता है कि विश्वविद्यालय “मेरिट”, “समान अवसर” और “बौद्धिक स्वतंत्रता” के केंद्र हैं। यह दावा जितना आकर्षक है, उतना ही खोखला भी है। ज़मीनी सच्चाई यह है कि भारतीय विश्वविद्यालयों के भीतर जातिगत भेदभाव कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरी जड़ें जमाए संरचनात्मक व्यवस्था है। इस व्यवस्था की शिक्षा जातिगत विशेषाधिकार रखने वाले वर्ग बचपन से ही देना शुरू कर देते हैं। यदि हम हिमाचल प्रदेश की मिड-डे मील व्यवस्था पर नज़र डालें, तो वहाँ भी यह भेदभाव अलग-अलग रूपों में मौजूद दिखता है—अक्सर बिना किसी औपचारिक शिकायत के, बिना किसी विवाद के। यही इसकी सबसे खतरनाक शक्ल है: जब तक अन्याय का विरोध नहीं होता, तब तक “भाईचारा” और “सामाजिक सौहार्द” का भ्रम बना रहता है।
यह व्यवस्था खुले अपमान से ज़्यादा ख़तरनाक तरीक़े से काम करती है—नियमों, प्रक्रियाओं, मूल्यांकन प्रणालियों और संस्थागत चुप्पी के ज़रिये। यही कारण है कि इसे बार-बार नकारा जाता है, और यही कारण है कि यह आज भी जीवित है। इसी व्यवस्था के कारण रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे नाम सामने आते हैं। ये नाम किसी भावनात्मक विमर्श के प्रतीक नहीं हैं; ये उस संस्थागत हिंसा के ठोस प्रमाण हैं, जो कहती कुछ नहीं, लेकिन करती बहुत कुछ है—छात्र को अलग-थलग करना, उसकी योग्यता को लगातार संदेह की दृष्टि से देखना, और अंततः उसे टूटने के लिए छोड़ देना। यह व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की सामूहिक विफलता है। जिन विश्वविद्यालयों को सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र होना चाहिए था, वे आज भी जातिगत प्रभुत्व के दुर्ग बने हुए हैं। यहाँ भेदभाव गाली की तरह नहीं, बल्कि सरकारी फ़ाइल की तरह आता है—दाख़िले की सूची में, फेलोशिप रोकने के निर्णयों में, मूल्यांकन की अस्पष्ट टिप्पणियों में, और शिकायतों को “आपसी मामला” बताकर दबा देने में। यही वजह है कि भेदभाव को साबित करना कठिन और नकारना आसान हो जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कठिनाई कभी किसी चीज़ के अस्तित्व को ख़त्म नहीं करती—बल्कि उसे और ज़्यादा ख़तरनाक बनाती है। इसी पृष्ठभूमि में आरक्षण को लेकर फैलाई जा रही नफ़रत और झूठ सबसे ज़्यादा चिंताजनक हैं। आरक्षण को आज भी “रियायत” या “छूट” के रूप में पेश किया जाता है। शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में प्रवेश पाने वाले छात्रों पर पहले ही “कोटे का टैग” चिपका दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि आरक्षण भारतीय संविधान का मूलभूत औज़ार है—सदियों से शिक्षा, ज्ञान और सत्ता से वंचित रखे गए समुदायों को बराबरी का अवसर देने के लिए। इसके बावजूद जैसे ही कोई दलित, आदिवासी या पिछड़े वर्ग का छात्र विश्वविद्यालय में दिखता है, उसकी पहचान तुरंत “आरक्षित” के रूप में तय कर दी जाती है—मानो उसकी मेहनत, संघर्ष और प्रतिभा स्वतः ही अमान्य हो गई हो। हाल के दिनों में सार्वजनिक बहसों और मीडिया विश्लेषणों में जिस तरह की शब्दावली दलित समाज को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है, वह इसी मानसिकता का परिणाम है। “कोटे से हो या कोठे से” जैसे जुमले केवल अपमान नहीं, बल्कि जातिगत घृणा, स्त्री-विरोध और वर्गीय अहंकार का संयुक्त विस्फोट हैं। यह बताता है कि समस्या मेरिट की नहीं, बल्कि बराबरी से डर की है।
अगर सच में योग्यता की इतनी चिंता है, तो सवाल यह होना चाहिए कि वे लोग, जो बिना किसी आरक्षण के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और कुलपति पदों तक पहुँचे, वे किस कोटे से आए? वे आए उस अदृश्य लेकिन शक्तिशाली कोटे से—जातिगत विशेषाधिकार, संसाधन, भाषा, संस्कृति, नेटवर्क और सिफ़ारिशों के कोटे से। लेकिन इन पर कभी सवाल नहीं उठता। EWS को भी “कोटा” नहीं माना जाता, क्योंकि उसे “सामान्य” घोषित कर दिया गया है। असल में जिसे मेरिट कहा जाता है, वह अक्सर विशेषाधिकार का दूसरा नाम होता है।
विडंबना यह है कि जिस आरक्षण को “खतरा” बताया जाता है, वह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आज भी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। प्रोफ़ेसर स्तर पर SC, ST और OBC के 60–80 प्रतिशत पद आज भी खाली हैं। यानी न प्रतिनिधित्व पूरा हुआ है, न सत्ता संरचना बदली है। इसके बावजूद सबसे ज़्यादा शोर आरक्षण के ख़िलाफ़ है। यह शोर इस बात का संकेत नहीं कि मेरिट ख़तरे में है, बल्कि इस डर का प्रमाण है कि अगर आरक्षण ईमानदारी से लागू हो गया, तो विश्वविद्यालयों का सामाजिक चरित्र बदल जाएगा।
इसी संदर्भ में नया UGC रेगुलेशन सामने आता है, जिसे सरकार सामाजिक न्याय की पहल बताने की कोशिश कर रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह क़ानून किसी नैतिक जागृति का परिणाम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के लगातार हस्तक्षेप और दबाव से पैदा हुई मजबूरी है। अदालत के सवालों—भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई, आरक्षण की स्थिति और छात्र आत्महत्याओं की ज़िम्मेदारी—ने व्यवस्था को जवाबदेह बनने पर मजबूर किया। मेरिट और समानता को आमने-सामने खड़ा करना एक सुनियोजित राजनीतिक चाल है। मेरिट तभी संभव है, जब मैदान बराबर हो। जब स्कूल, संसाधन, सामाजिक व्यवहार और अवसर समान नहीं, तब “बराबर प्रतियोगिता” की बात करना बौद्धिक बेईमानी है। समानता के बिना मेरिट एक भ्रम है। राहत इंदौरी की पंक्तियाँ—“सबका ख़ून शामिल है यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है”—आज विश्वविद्यालयों के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। यह देश, इसके संस्थान और इसकी कुर्सियाँ किसी एक जाति या वर्ग की बपौती नहीं हैं। जब तक किसी छात्र को उसकी पहचान के कारण बार-बार खुद को साबित करना पड़े, तब तक यह कहना ज़रूरी ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि भेदभाव कोई कल्पना नहीं, बल्कि आज की सबसे ठोस, सबसे क्रूर और सबसे जीवित हक़ीक़त है।

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