अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार* — आशीष कुमार
*अम्बेडकरवाद: संघर्ष का व्यापक औजार, न कि सीमित पहचान की मीनार*
— आशीष कुमार
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भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर को अक्सर “संविधान के जनक” के रूप में याद किया जाता है। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल शब्द न होकर जीवन का आधार बनें। लेकिन आज के दौर में अंबेडकर को समझना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है, क्योंकि जिन मूल्यों के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वही आज चुनौती के घेरे में हैं। हर साल 14 अप्रैल को मनाई जाने वाली अम्बेडकर जयंती केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि का दिन नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर भी है। वर्ष 2026 में हम अंबेडकर की 135वीं जयंती मना रहे हैं,यह केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि उनके विचारों को वर्तमान संघर्षों से जोड़ने का महत्वपूर्ण क्षण है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि अंबेडकर के विचारों को सिर्फ माल्यार्पण तक सीमित करना, उनके संघर्ष की भावना के साथ अन्याय है। असली श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम उनके बताए रास्ते पर चलकर सामाजिक बदलाव की दिशा में ठोस कदम उठाएं।
अम्बेडकरवाद को आज जानबूझकर एक सीमित पहचान की राजनीति तक समेटने की कोशिश की जा रही है—जैसे यह केवल एक जाति विशेष का विचार हो। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। अम्बेडकरवाद एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का दर्शन है, जो हर प्रकार के शोषण के खिलाफ संघर्ष की दिशा देता है। इसे सीमित करना, उसके क्रांतिकारी स्वरूप को कमजोर करना है।
अगर आज बाबा साहब होते, तो वे केवल प्रतीक बनकर संतुष्ट नहीं रहते। वे नई शिक्षा नीतियों के खिलाफ खड़े दिखाई देते, जो शिक्षा को आम लोगों की पहुंच से दूर करती हैं। वे मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करने वाले श्रम कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे होते, किसानों के संघर्ष के साथ खड़े होते, और हर उस नीति का विरोध करते जो गरीब, मजदूर और वंचित वर्गों को हाशिये पर धकेलती है।
अम्बेडकर ने केवल जाति उन्मूलन की बात नहीं की, बल्कि समाज के हर कमजोर तबके के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। महिलाओं के अधिकारों के लिए उन्होंने हिंदू कोड बिल जैसा ऐतिहासिक कदम उठाया। मजदूरों को संगठित करने के लिए उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया। यह दिखाता है कि उनका संघर्ष बहुआयामी था जाति, वर्ग और लिंग, तीनों स्तरों पर बाबा साहब ने काम किया बाबा साहब का मकसद हर उस शोषित वर्ग की आवाज बनना था ,उनका मकसद सिर्फ किसी जाति विशेष के लिए. संघर्ष करना नही था , आज जब देश में आर्थिक असमानता बढ़ रही है और पूंजी कुछ हाथों में सिमटती जा रही है, तब अंबेडकर की चेतावनी और भी प्रासंगिक हो जाती है। उन्होंने कहा था कि सामाजिक और आर्थिक असमानता के रहते राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता। यही वह बिंदु है जहां अम्बेडकरवाद और वामपंथी विचारधारा एक साझा जमीन पर खड़े नजर आते हैं।
भारतीय समाज की सच्चाई यह है कि यहां जाति और वर्ग एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि गहराई से जुड़े हुए हैं। जाति समाज को बांटती है, और बंटा हुआ समाज कभी संगठित होकर आर्थिक शोषण के खिलाफ नहीं लड़ पाता। इसलिए अम्बेडकरवाद को केवल “पहचान की राजनीति” तक सीमित रखना, दरअसल उस व्यवस्था को मजबूत करता है जो शोषण पर टिकी हुई है। आज जरूरत इस बात की है कि दलित, आदिवासी, मजदूर और किसान सभी एक साझा मंच पर आएं और संघर्ष को व्यापक बनाएं। लेकिन दुर्भाग्य से, आज सवाल उन गरीबों से पूछा जा रहा है जो दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि असली सवाल उन लोगों से होना चाहिए जिन्होंने संविधान का लाभ उठाकर अपनी स्थिति मजबूत की, लेकिन आज जब उसी संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, तब वे खामोश हैं।
आज देश में एक अजीब विडंबना देखने को मिलती है कि जो युवा शिक्षा और अधिकारों की बात करते हैं, उन्हें जेलों में डाला जाता है, जबकि दिखावे और धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने वालों पर फूल बरसाए जाते हैं। यह वही स्थिति है, जिसके खिलाफ अंबेडकर ने चेताया था उन्होने बार बार चेताया था की जहां असली मुद्दों से ध्यान भटकाकर समाज को बांटा जाता है।अम्बेडकरवाद को एक जाति और एक पहचान में कैद करने वाले दरअसल उसे निष्क्रिय बनाना चाहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यह विचार एक जिंदा हथियार है जोकि अन्याय, असमानता और शोषण के खिलाफ लड़ने का हथियार है । इसे जितना व्यापक जनसंघर्षों से जोड़ा जाएगा, यह उतना ही शक्तिशाली होगा।
आज, 135 वी अम्बेडकर जयंती के इस ऐतिहासिक अवसर पर, दायित्व यही है कि अम्बेडकरवाद को उसके असली रूप में समझा जाए एक ऐसे व्यापक औजार के रूप में, जो समाज को जड़ से बदलने की क्षमता रखता है। यह न किसी एक वर्ग की जागीर है, न किसी एक पहचान तक सीमित विचारधारा। यह एक क्रांतिकारी चेतना है, जो तब तक जिंदा रहेगी जब तक अन्याय के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।

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