मजदूरों के न्यूनतम वेतन पर फैसला, लेकिन प्रमुख ट्रेड यूनियनें ही बोर्ड से बाहर!

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 मजदूरों के न्यूनतम वेतन पर फैसला, लेकिन प्रमुख ट्रेड यूनियनें ही बोर्ड से बाहर! ________________________________________________ मजदूरों के न्यूनतम वेतन पर फैसला, लेकिन प्रमुख ट्रेड यूनियनें ही बोर्ड से बाहर! सीटू, एटक और इंटक को न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड से बाहर रखना मजदूर-विरोधी पक्षपात: सीटू सीटू ने मोदी सरकार के कदम की निंदा की, देशव्यापी प्रतिरोध की तैयारी का आह्वान नई दिल्ली। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा पुनर्गठित केंद्रीय न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड में देश की प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों को प्रतिनिधित्व नहीं दिए जाने का सीटू ने कड़ा विरोध किया है। सीटू ने इसे सरकार का स्पष्ट मजदूर-विरोधी और पक्षपातपूर्ण रवैया करार देते हुए देशभर के मजदूरों और ट्रेड यूनियनों से इसके खिलाफ आवाज बुलंद करने का आह्वान किया है। केंद्र सरकार ने 21 जुलाई 2026 को केंद्रीय न्यूनतम वेतन सलाहकार बोर्ड का पुनर्गठन कर अधिसूचना जारी की, जिसे सार्वजनिक रूप से काफी बाद में उपलब्ध कराया गया। हैरानी की बात यह है कि देश की प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों में शामिल सीटू, एटक और इंटक को इस बोर्ड में प्रतिनिधित्...

पंचायती राज संस्थाओं में क्या प्रतिनिधित्व सिर्फ दिखावा है, या फैसले लेने की ताकत सच में बदली है?*”


 *पंचायती राज संस्थाओं में क्या प्रतिनिधित्व सिर्फ दिखावा है, या फैसले लेने की ताकत सच में बदली है?*”

आशीष कुमार आशी ______________________________________________


हिमाचल प्रदेश में देर से ही सही  मगर पंचायती राज चुनाव का बिगुल बज चुका है ,इस प्रक्रिया. को पुरा करने से पहली सबसे बड़ी चुनौती जो होती है.  रोस्टर प्रणाली  जो  की हमारे पंचायती राज अधिनियम् 1994 के तहत तय किया जाता है और यह हमारे संविधान के 73 वें संशोधन के अनुरूप है । इस संशोधन  से   पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य स्पष्ट था दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों और महिलाओं को स्थानीय सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करना। कागज़ों पर यह व्यवस्था लोकतंत्र को गहराई देती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कई स्थानों पर इसकी प्रभावशीलता सीमित नजर आती है। पंचायतों में सीटें आरक्षित जरूर हैं, पर वास्तविक निर्णय लेने की प्रक्रिया कई बार कुछ सीमित हाथों में सिमटी हुई दिखाई देती है। गांवों में “भाईचारा” और “सहमति” के नाम पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की प्रवृत्ति भी सामने आती है। कई बार उम्मीदवारों का चयन पहले ही तय हो जाता है और चुनाव परिणाम उसी दिशा में जाते हैं। कुछ पंचायतों में “सर्वसम्मति” के नाम पर पर्ची डालने की परंपरा भी देखने को मिलती है। कई जगहों पर यह भी कहा जाता है कि उम्मीदवार बनने की प्रक्रिया में आर्थिक शर्तें—जैसे   भारी भरकम आयोजनों पर खर्च  और भारी धनराशि का उपयोग होना  भी जुड़ जाता हैं। ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से हो, चुनावी प्रक्रिया से दूर हो जाता है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि हर व्यक्ति को समान अवसर मिले, विशेषकर चुनाव में अपनी दावेदारी रखने का अधिकार। लेकिन जब आर्थिक और सामाजिक प्रभाव ज्यादा निर्णायक हो जाएं, तो यह समान अवसर व्यवहार में कमजोर पड़ जाता है। रोस्टर लागू होने के बाद भी कई बार प्राथमिकता आर्थिक रूप से सक्षम या प्रभावशाली व्यक्तियों को मिलती है, जिससे कमजोर तबकों की भागीदारी सीमित रह जाती है। यह स्थिति हमें *पूना पैक्ट की उस ऐतिहासिक बहस की याद दिलाती है, जहाँ डॉ. भीमराव अंबेडकर ने प्रतिनिधित्व के साथ-साथ वास्तविक शक्ति के सवाल को प्रमुखता से उठाया था।* आज पंचायतों में दिखने वाली चुनौतियों को उसी मूल चिंता—प्रतिनिधित्व बनाम प्रभावी नियंत्रण—की एक समकालीन झलक के रूप में देखा जा सकता है।

इस पूरी व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी एक और महत्वपूर्ण सवाल  है। पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के बावजूद, कई मामलों में वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पातीं। परिवार या स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का प्रभाव उनके निर्णयों पर दिखाई देता है। “प्रॉक्सी नेतृत्व” या “सरपंच पति” जैसी स्थितियाँ भी कुछ स्थानों पर देखने को मिलती हैं, जिससे महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सीमित हो जाती है। ये स्थिति और भी  जटिल तब हो जाती है जब सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाएं नेतृत्व की भूमिका में आती हैं। यहाँ लिंग, सामाजिक स्थिति और आर्थिक सीमाओं का संयुक्त प्रभाव उनके कामकाज को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में उनके लिए स्वतंत्र और प्रभावी नेतृत्व स्थापित करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। यह पूरी स्थिति लोकतंत्र की गुणवत्ता पर विचार करने का अवसर देती है। यदि प्रतिनिधित्व तो है, लेकिन निर्णय लेने की शक्ति सीमित है, तो आरक्षण का उद्देश्य पूर्ण रूप से साकार नहीं हो पाता। समाधान केवल कानून बनाने में नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और संस्थागत मजबूती में है। ग्राम सभाओं को अधिक सक्रिय और सशक्त बनाना, निर्वाचित प्रतिनिधियों—विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों—के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता बढ़ाना, चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और समान अवसर की संस्कृति को बढ़ावा देना—ये सभी आवश्यक कदम हैं। अंततः प्रश्न यही है—क्या हम केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर रहे हैं, या वास्तविक सशक्तिकरण की दिशा में भी बढ़ रहे हैं? जब तक निर्णय लेने की शक्ति व्यापक रूप से साझा नहीं होगी, तब तक लोकतंत्र की जड़ें पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकतीं। हिमाचल की पंचायतों में आज इसी संतुलन और   सुधार की आवश्यकता है।

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