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Showing posts from May, 2021

भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

सीटू विचार भी ,हथियार भी:---- विजेंद्र मेहरा

 *सीटू - विचार भी,हथियार भी* *विजेंद्र मेहरा* *प्रदेशाध्यक्ष सीटू,हि. प्र.*            30 मई भारत वर्ष के क्रांतिकारी मजदूर वर्ग के लिए कोई आम दिन नहीं है। यह दिन भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इस दिन मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी व वैज्ञानिक विचारधारा वाले मजदूर संगठन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियनज़(सीटू) का वर्ष 1970 में कलकत्ता में जन्म हुआ था। भारत वर्ष का मजदूर आंदोलन देश के साम्राज्यवाद,उपनिवेशवाद,सामंतवाद विरोधी आंदोलन का प्रतिबिम्बन रहा है। वर्ष 1920 में जब देश में मजदूर संगठन एटक का गठन हुआ तो यह दो बुनियादी बातों को लेकर संघर्षरत हुआ। पहली बात यह थी कि मजदूर वर्ग शोषणकारी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई तेज करके शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिये कार्य करेगा। दूसरी बात यह थी कि मजदूर,किसान,खेतिहर मजदूर,महिला,छात्र व नौजवान तबकों की व्यापक एकता कायम करते हुए देश से ब्रिटिश हुकूमत को खदेड़ने के लिए देश के आज़ादी के आंदोलन में यह अपनी निर्णायक भूमिका निभाएगा। इसी बुनियाद पर भारत में मजदूर आंदोलन की राष्ट्रव्यापी बुनियाद खड़ी की गई। इसी परिदृश्य म...

राष्ट्रवाद के डिस्कोर्स में कांग्रेसी पूरी तरह आरएसएस के गिरफ्त में फंस चुके हैं।:---राजीव कुंवर

 राष्ट्रवाद के डिस्कोर्स में कांग्रेसी पूरी तरह आरएसएस के गिरफ्त में फंस चुके हैं।  किसी भी कांग्रेसी से बात कीजिए वे भी राष्ट्रवाद का साम्राज्यवाद विरोधी स्वरूप विस्मृत कर चुके हैं। एक कांग्रेसी सज्जन बोले कि बताएं जिन्ना की तस्वीर को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगाने का क्या मतलब ? वे हमास के हमले और इजरायल के हमले को एक ही श्रेणी में रखने की बात करते हैं परंतु थोड़ा कुरेदने पर हमास को आतंकवादी संगठन वैसे ही कहते हैं जैसे आरएसएस। एकदम से ताव में आकर वे बोले कि आखिर हमास को फिलिस्तीन की ठेकेदारी किसने दे दी? यासिर अराफात तो ठीक पर हमास कैसे ठीक ? मैंने हल्के से पूछ दिया कि सुभाषचंद्र बोस को किसने ठेकेदारी दी थी? गूँगियाने लगे।  हिंसा अपने आप में कोई मूल्य थोड़े न रखता है! पहले तो सर्वाइकल ऑफ द फिटेस्ट से लेकर बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है का नेचुरल जस्टिस मने प्राकृतिक न्याय माना जाता था। आधुनिक सार्वभौमिक मूल्य ने इसे बदल दिया। हर व्यक्ति की स्वतंत्रता और बराबरी को सार्वभौमिक मूल्य माना गया। ऐसे में स्वतंत्रता और बराबरी के लिए प्रतिरोध को मूल्यवान माना गया। स्वतंत्रत...