जाति का दर्द नही झेला. इसलिए आरक्षण पर दे रहे है शांता कुमार ज्ञान*:--आशीष कुमार

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 *जाति का दर्द नही झेला. इसलिए  आरक्षण पर दे रहे है शांता कुमार ज्ञान*  *गरीबी नहीं, सामाजिक भेदभाव है असली कारण*           ( आशीष कुमार. राज्य संयोजक शोषण मुक्ति मंच ) शांता कुमार  द्वारा कुछ दिन पूर्व दिये ब्यान में  यह कहना कि देश में आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि केवल गरीबी होना चाहिए, न तो कोई नया तर्क है और न ही यह भारतीय समाज की वास्तविकता को समझने वाला दृष्टिकोण है। सच यह है कि भारत में आरक्षण की व्यवस्था गरीबी दूर करने के लिए नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों की असमानता को दूर करने के लिए बनाई गई थी। भारत का संविधान, जिसे B. R. Ambedkar जैसे महान समाज सुधारकों ने गढ़ा, इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि कुछ जातियों को केवल आर्थिक रूप से नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी दबाया गया। इसलिए आरक्षण सामाजिक न्याय का एक संवैधानिक उपाय है, न कि कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम। अगर आरक्षण को केवल आर्थिक आधार से जोड़ने की बात की जाती है, तो यह भी पूछा जाना चाहिए कि EWS आरक्षण पर शांता कुमार जैसे नेता अक्सर खाम...

अवसर की समानता और बाबा साहब का सपना*




आशीष कुमार 

राज्य सह संयोजक

दलित शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश

एवम केंद्रीय कमेटी सदस्य दलित शोषण मुक्ति मंच


आज  बाबा साहब का 67 वां महापरनिर्वाण दिन   है। आज के दिन खास कर इस बार हर दल अम्बेडकर जी के सपनो का भारत बनाने की बात करंगे और बेशुमार वायदे भी करेंगे, और उनके विचारों  पर चलने की अपील भी करेंगे ,ऐसा लाजमी भी है, परन्तु आज  देश में   लोकतंत्र की हत्या का दौर चला है  ,और मौजूदा व्यवस्था में  संविधान  बचाने के लिए हम मौजूदा सरकार से सवाल भी खड़े करने की हिम्मत नही कर पा रहे है। आज के दिन  वो लोग भी अम्बेडकर महापरिनिर्वाण की  जयंती पर माला अर्पण करते है जिनको इस देश के संविधान से कोई खास लगाव नही है ,  अपितु वह लोग हर जगह संविधान की धज्जियां उड़ाते रहते है।  जाने अनजाने हम किसी न किसी रूप में  उन लोंगो को ही  बढ़ावा दे रहे है जो कि अम्बेडकर जी के विचारों से कोई वास्ता नही रखते है या ऐसा कह सकते है  बाबा साहब की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है, आज  विचारों की क्या विषमताएं है  कुछ  महान पुरषों की पंक्तियो का जिक्र यँहा करने जा रहा हूँ ,मैं यँहा कहते हुए बिल्कुल भी असहज महसूस नही कर रहा हूँ कि मार्क्सवाद में  और वर्ग संघर्ष से देश मे अवसर की समानता पैदा की जा सकती है परन्तु संघ के विभाजनकारी कार्यक्रम से नहीं,  अगर हम थोड़ी देर के लिए भगत सिंह और सावरकर के विचारों को देखे तो आप स्वयं समझ  जाएंगे कि  विचारधारों में ही शोषण के विरुद्ध लड़ने की मंशा होती है और व्यवहारिक रूप से जब आप इस  समाज में आगे बढ़ते रहते है तो विचारधाराओं का  प्रतिबिम जरूर आपको नजर आने लगता है ,परन्तु हम किसी विचार के इतने गुलाम हो जाते है कि हम अपने शोषण को समझ ही नही पाते ,या यूं समझ लो कि हम अंधभक्त हो जाते है।


 यँहा  विचारों में  अंतर देखिए।


भगत सिंह:--भगत सिंह जी जब वर्ण व्यवस्था को खत्म करके अछूतों को बराबरी का हक़ देने की बात करते है तब सावरकर को जाति प्रथा में थोड़ी सी भी ढील नस्ल और खून की शुद्धता पर खतरा नजर आता है। भारत के इतिहास के  छे यशस्वी युग मे सावरकर ने लिखा है "जाति प्रथा का एक मात्र लक्ष्य अपने नस्लीय बीज और खून तथा जाति जीवन और परम्पराओं की रक्षा और उन्हें किसी भी प्रदूषण से मुक्त रखना है।  सावरकर का ये कहना कि प्रत्येक जाति चाहे वह  ब्राह्मण हो या भंगी हो, उसे अपनी  अलग पहचान पर गर्व करना चाहिए। इसे ऐसा सोचो कि एक उच्च जाति के लोगों को खुद पर गर्व हो सकता है मगर शुद्र के गर्व का क्या अर्थ है? क्या वे  उच्च वर्ण की गुलामी पर गर्व करे, इससे बाबा साहब की जाति के विनाश की बात पर भी चर्चा बन्द हो जाती है,  क्योंकि यदि दोनों अपनी अपनी जाति पर गर्व महसूस करते रहे तो पूरा समाज वर्ण व्यवस्था की समस्या पर विचार ही नही कर सकता आज देश के अंदर भी जाति पर आधारित  जो संगठन बने है उन्हें बिल्कुल भी इस बात का एहसास  नही की वे अम्बेडर के नाम पर ही  अम्बेडकर के विचारों की धज्जियां उड़ा रहे है,हम लोग अक्सर देखते है 

है कि जाति पर आधारित  बने संगठनों के अन्दर भी एक नई पहचान बनती जा रही है,सोशल मीडिया के ग्रुप में हम अक्सर  लोग आपस मे प्रतिस्पर्धा कर रहे है आपसी प्रतिस्पर्धा लगी है कि मैं किसी जाति विशेष का पक्का आदमी हूं, इनमें भी अलग नजरिया बनता जा रहा है जोकि समय के साथ बढ़ता जाएगा,  जाति पर आधरित बने संगठनों के अंदर हम लोग जाने अनजाने में अपने आप को किसी अन्य जाति से श्रेष्ठ बनाने की कोशिश करते है जोकि मनुवादी और शासक वर्ग की पार्टीयों का एक प्रायोजित एजेंडा है, 


आज तक सरकार चाहे कोई भी बने या संविधान में दिए गए प्रावधानों के अंदर चाहे कोई विधायक संसद या राष्ट्रपति बन जाये परन्तु ये सभी लोग शासक वर्ग की राजनीतिक पार्टियों के इतने गुलाम बन गए है कि कोई आवाज उठा ही नही सकते। अधिकतर हमने अपने छोटे से अनुभव के आधार पर  देखा  की अगर कोई भी सामाजिक मुद्दों की लड़ाई हो तो सभी शोषित तपको की नजरें कम्युनिस्टों की तरफ होती है, जनता जानती तो है कि हमारी लड़ाई को अगर कोई निष्पक्ष रूप से लड़ेगा तो वे सिर्फ और सिर्फ वामपंथी ही  है ,और ऐसा एक नही हजारों मसलों में देखा गया है, हमारे अपने जिला में  चाहे वो दलित महिला से मार पिटाई का  हो या फिर  प्रदेश में  हुए दर्दनाक हत्यकाण्डों की बात हो   , अक्सर  देखने मे ये आया है  कि वामपंथी नेताओं का शोषण के खिलाफ स्टैंड इतना साफ रहता है कि  वे अपनी जाति और समाज के खिलाफ भी शोषण के खिलाफ लड़ने को तैयार रहते है , अतः आज हम जब बाबा साहिब की 67वां महा परिनिर्वाण दिवस  मना रहे तो हम लोगों को ये  सोचना भी जरूरी है कि हम अम्बेडकर की जयंती और पुण्य तिथि तो मना लेते है परन्तु  वास्तव में हम अम्बेडकर के विचारों पर अमल नही  करते है ,  आज हम लोगों को ये संकल्प लेना चाहिए कि महापरिनिर्वाण दिवस को हम एक  स्मरणोत्सव के रूप में मनाएं  और  बाबा साहब से प्रेरणा लेकर आत्म सुधार का अवसर भी इसमे देखें, इसलिए हमें जातीय चेतना का नाश करके उनके विचारों में  विकास शील चेतना और  वर्गीय चेतना को मजबूत करने के लिए   काम करे, जो इस देश के अंदर बढ़ रही असमानताओं को दूर करने के लिए और जाति के विनाश के लिए बिना किसी राजनीतिक लाभ के भी दलित समाज के जीवन को बेहतर बनाने को संघर्ष जारी रखेंगे ।

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