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Showing posts from April, 2019

भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

शिमला संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे दो फौजियों और एक सब्जी वाले रवि कुमार में अंतर

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शिमला संसदीय क्षेत्र में इस बार दो राष्ट्रीय पार्टीयों से मुख्यता कांग्रेस और भाजपा से 2 फौजी मैदान में है , चुनाव के गलियारों में ये चर्चा जोरों शोरो से है कि इस बार दो फौजी मैदान में है , यँहा तक कि एक प्रत्याशी ने तो अपने आप मे और अपने प्रतिद्वंदी में क्या अंतर है ये भी बताना शुरू कर दिया और समाचारो में और सोशल मीडिया में खूब उछाला  की आखिर  इन दोनों फ़ौजियीं में किस कदर अंतर है, परन्तु साथियो आज में आपको ये बताना चाहता हूँ कि एक सब्जी बेचने वाले रवि कुमार दलित और दो आर्मी से सेवानिवृत्त हो कर आये फौजियों में अंतर क्या है, दोनो फौजियों की वीरता की गाथा तो उनके प्रशंसक आपको प्रचार प्रसार के माध्यम से मिलता रहेगा, सबसे बड़ा अंतर तो ये है कि इन दोनों फौजियों के पास 70 लाख जो चुनाव आयोग ने निर्धारित किया है वो राशि चुनाव लड़ने को होगी, 70 लाख ही क्या हो सकता है कि उनकी ये राशि उनके पास करोड़ों में हो परन्तु एक सब्जी वाला जो चुनाव लड़ रहा है जोकि कोई  राजनेता नही है सिर्फ और सिर्फ दोनो राजनीतिक दलों के खिलाफ जिसके ये प्रत्याशी एक नही दर्जनों दलितों के साथ हुए अत्याचारों के खिल...

आखिर क्यों पूरा नही हो पा रहा है बाबा साहब का सपना:-----आशीष कुमार आशी

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आज जब लोक सभा का चुनाव है इस ही चुनाव के दौरान हम बाबा साहब की 128 वां जन्मदिन मना रहे है। आज के दिन खास कर इस बार हर दल अम्बेडकर जी के सपनो का भारत बनाने की कोशिश करंगे और बेशुमार वायदे भी करेंगे,ऐसा लाजमी भी है, परन्तु चुनाव के इतने शोर शराबे में ये भी लाजमी है कि हम मौजूदा सरकार ने सवाल भी खड़े नही करेंगे, आज के दिन हम उन लोगों को भी अम्बेडकर जयंती में मालार्पण करने बुलाते है जिनको इन देश के संविधान से कोई खास लगाव नही  अपितु वह लोग हर जगह संविधान की धज्जियां उड़ाते रहते है।  जाने अनजाने हम किसी न किसी रूप में  उन लोंगो को ही  बढ़ावा दे रहे है जो कि अम्बेडकर जी के विचारों से कोई वास्ता नही रखते थे या ऐसा कह सकते है  बाबा साहब की विचारधारा से विपरीत थे, मुझे यँहा विचारों की क्या विषमताएं है  कुछ पंक्तियन का जिक्र यँहा करने जा रहा हूँ में यँहा कहते हुए बिल्कुल भी असहज महसूस नही कर रहा हूँ कि मार्क्सवाद में  और वर्ग संघर्ष से देश मे अवसर की समानता पैदा की जा सकती है, अगर हम थोड़ी देर के लिए भगत सिंह और सावरकर के विचारों को देखे तो आप स्वयं समझ  जाएं...

सेना की शहादत देश के लिए होती है न की राजनीतिक दलों के वोट के लिए :--आशीष कुमार आशी

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17 वी लोक सभा के चुनाव अपनी चरम सीमा पर है , सभी राजनीतिक दल किसी न किसी मुद्दों को  ले कर जनता के बीच जा रहे है, सभी राजनीतिक पार्टीयों के लोग अपने घोषणा पत्र के माध्यम से जनता के बीच  जा रहे है, परन्तु अगर देखा जाए तो घोषणा पत्र तो पिछली लोकसभा के चुनाव के दौरान भी था उसमें से कुछ वायदे ऐसे भी थे जिनको तो खुद घोषणा पत्र बनाने वाली पार्टी ने खुद ही जुमला कह दिया । तो फिर घोषणा पत्र का औचित्य क्या रह जाता है, जब बात चुनाव की आती है  तो हम केवल सरकार बनाने के लिए ही वोट नही करते बल्कि लोकतंत्र और इस देश को मजबूत बनाने के लिए वोट करते है, पिछले 5 वर्षों में जो लोकतंत्र की हत्या हुई है वह किसी से छुपी नही है , अगर इन  5 सालों की तुलना की जाए तो लोकतंत्र के जो हाल और सरकारी संस्थाओं का जो हाल पिछले 5 वर्षों में हुआ है ये भी एक प्रकार का अघोषित आपातकाल की तरह रहा है, पिछली सरकार ने हरेक सरकारी तंत्र और उनकी स्वयत्तता को भंग करने के इलावा कोई ऐसा काम नही किया जिससे  ये कहा जा सके  की ये दौर अघोषित आपातकाल का नही था। अभी आप लोग देखे की चुनाव आचार सहिंता का उलंघन ...

छोटे लक्ष्य के लिए बड़े नुकसान की तरफ बढ़ते सरकारी कदम----आशीष कुमार आशी

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पिछले काफी समय से देश के अंदर कुछ न कुछ नया और कुछ अजीब सा प्रतीत होने वाली हरकते हम कह सकते है कि हमारी सरकार द्वारा की जा रही है चाहे वो किसी प्रदेश की हो या फिर केंद्र की,अगर हम 2014 से आज तक देखे तो  आज देश मे सत्तासीन लोगों से  सवाल खड़ा करना या पूछने में डर सा महसूस होता है। सबसे अधिक में ये रोहित वेमुला की हत्या के बाद इन चीज को महसूस कर रहा हूँ , निश्चित रूप से मेरी राय आपकी राय से भिन्न हो सकती है उस विचारों की भिनता का मै इस देश की बेहतरी के लिए सम्मान करता हूँ,ये कोई रोहित की एक घटना नही परन्तु जवाहरलाल विश्वविद्यालय से ले कर गोरी लंकेश कलबुर्गी जैसे लोगो की हत्या इनमे से एक है, अगर हम ये देखे की ये लोग कोन थे तो साफ साफ नजर आता है कि ये कोई पार्टी विशेष के नही बल्कि समाज मे जो हो रहा है उन गलत विचारों का विरोध तर्कों के साथ  करते है, परन्तु अब सवाल ये उठता है कि आखिर जो तर्क के साथ सरकार से और इस गली सड़ी व्यवस्था से सवाल पूछता है उन लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, क्या समाज मे ये हत्या करने वाले असमाजिक तत्व रातों रात पैदा हो जाते है या फिर किसी बड़ी स...