तीन महीने के वेतन व एरियर के भुगतान के निर्देश,नौकरी से नहीं हटेंगे मिड डे मील वर्करज

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तीन महीने के वेतन व एरियर के भुगतान के निर्देश,नौकरी से नहीं हटेंगे मिड डे मील वर्करज शिमला। मिड डे मील वर्कर्स यूनियन संबंधित सीटू का प्रतिनिधिमंडल आज निदेशक प्रारंभिक शिक्षा विभाग से मिला। प्रतिनिधिमंडल में सीटू राज्य कोषाध्यक्ष जगत राम, सचिव बालक राम, रामप्रकाश तथा मिड डे मील वर्कर्स यूनियन की महासचिव शांति देवी, विमला और बिमला देवी सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे। प्रतिनिधिमंडल ने मिड डे मील वर्कर्स को पिछले तीन महीनों से वेतन नहीं मिलने और एरियर के भुगतान का मुद्दा उठाया। निदेशक प्रारंभिक शिक्षा ने शिक्षा उपनिदेशक और शिक्षा खंड अधिकारियों को तीन महीने के वेतन व एरियर का भुगतान करने के निर्देश दिए। उन्होंने पूरा बकाया वेतन एक साथ देने तथा भविष्य में हर महीने समय पर पूरा वेतन देने का आश्वासन दिया। निदेशक ने यह भी आश्वासन दिया कि स्कूलों में क्लस्टर योजना लागू होने के कारण मिड डे मील वर्कर्स को नौकरी से नहीं हटाया जाएगा। मेडिकल चेकअप सहित अन्य समस्याओं के समाधान का भी आश्वासन दिया गया। यूनियन ने चेतावनी दी कि यदि अगले दो-तीन दिनों में वेतन का भुगतान नहीं हुआ तो ब्लॉक स्तर पर विरोध प्रद...

जमात की असलियत और आरोप

Ashok Kumar Pandey भईया का लेख

जमात की असलियत और आरोप
(लम्बा है लेकिन प्लीज़ पढ़ें ज़रा ग़ौर से)
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तबलीगी जमात असल में इस्लाम के भीतर एक पुनरुत्थानवादी आंदोलन है। डीटेल में न जाएँ तो इनका मानना है कि इस्लाम मानने वालों को ऐसा जीवन जीना चाहिए जैसा मुहम्मद साहब के ज़माने में जिया जाता था। यानी पाँच वक़्त की नमाज़, मर्द मूँछ साफ़ रखें बाक़ी दाढ़ी बढ़ने दें, घुटनों से ज़रा नीचे तक का पाजामा और ढीला कुर्ता पहनें, औरतें दोयम दर्जे पर घर के भीतर रहें, पर्दा करें, बच्चे पैदा करें और पालें, संगीत हराम है। सिद्धांत में इसे छः शिक्षाओं में व्यक्त किया जाता है - कलमा, सलाह, इल्म ओ ज़िक्र, इकराम ए मुस्लिम, इख़लास ए नीयत और दावत-ओ-तबलीग़। राजनीति और फ़िक़्ह (इस्लामी क़ानून) से खुद को अलग बताते हैं और क़ुरान तथा हदीस पर भरोसा करते हैं। कुल मिलाकर ये इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देते हैं और पढ़े-लिखे मुसलमान क़तई नहीं चाहते कि उनकी औलादें इनके चक्कर में पड़ें।

1926 में हिंदुस्तान में ही यह जमात बनी थी और अब दुनिया भर में फैली है। लाखों लोग जुड़े हैं। धन भी अकूत है। अरब मुल्कों ने ख़ूब बढ़ावा दिया है। पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ साहब के बाप इसके बड़े फ़ाइनेंसरों में थे और नवाज़ साहब के ज़माने में इनका ख़ूब असर बढ़ा। फ़्रांस वग़ैरह में इनसे जुड़े लोगों का नाम आतंकवादी कार्यवाहियों में भी आया। कुछ मुल्कों में बैन भी हैं।

काम करने का तरीक़ा यह है कि इनके धर्म प्रचारक देश दुनिया में घूम घूमकर लोगों को इस्लाम की शिक्षा देते हैं यानी अपने जैसा बनने को कहते हैं। घुमक्कड़ी और असावधानी के कारण ये भी कोरोना के कैरियर बने। एक मज़ेदार बात यह कि इनकी धर्म परिवर्तन वग़ैरह में कोई रुचि नहीं और ये सिर्फ़ मुसलमानों से बात करते हैं। ख़ुद मुसलमानों के भीतर इनका काफ़ी विरोध रहा है हमेशा से।

अब पीछे की तरफ़ लौटने की ज़िद एक जहालत तो है ही। सभी धर्मों के कट्टरपंथी यही करते हैं, ख़ैर। जमात में लोग जाते हैं तो मोबाइल भी जमा करा लिया जाता है। मनोरंजन के सभी साधन हराम माने जाते हैं। मस्जिदों में रुकते हैं।

तो कोरोना को लेकर इनकी नासमझी समझ आती है। वैसे भी जब इसकी ख़बरें आईं तो ज़्यादातर धर्मगुरु इसे मज़ाक़ में ही ले रहे थे। इन्होंने भी लिया। पाकिस्तान में इनके विरोध की वजह से मस्जिदें नहीं बंद हो पाईं न लॉकडाउन। जब हुईं तो ये सड़क पर बाजमात नमाज़ पढ़ने लगे। ख़ूब तमाशा किया और अब जाकर थोड़ा नियंत्रित हुए हैं जब देर हो चुकी है। पाकिस्तान में भी रोकने गए लोगों से बदतमीज़ी की यहाँ भी की। वह सब समझ आता है। बीस घटनाएँ हैं जहाँ हिंदुओं ने भी बदतमीज़ी की है सेंटर में और पुलिस के साथ भी।

लेकिन यह मानना मुश्किल है कि पाजामा पहनने वालों को क्वॉरंटीन सेंटर में पैंट किसने दे दिया? यह भी कि वहाँ म्यूज़िक कहाँ से आ गया और जमाती अचानक म्यूज़िक कैसे सुनने लगे यह ख़तरा उठाकर कि सीसीटीवी फ़ुटेज बाहर गई तो जमात से निकाल दिया जाएगा। यह भी कि बाजमात नमाज की इतनी फ़ोटो आ गईं लेकिन अश्लील हरकतों की कैसे रह गईं?

बहुत साफ़ कहूँ तो जमात जैसी फ़ोर्सेज का पक्का विरोधी होते हुए कहना चाहता हूँ कि असल में इनके बहाने असफलताओं को छिपा कर इसे हिंदू मुसलमान में बदलने के खेल में बेहद गिर गए हैं लोग।

इन अंधेरों में भी एक दिए की ज़रूरत है...

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