भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

मज़दूरों को राशन न मिलने पर कॉमरेड राकेश सिंघा धरने पर बैठे, तहसीलदार और SDM पर बरसे

मज़दूरों को राशन न मिलने पर कॉमरेड राकेश सिंघा धरने पर बैठे, तहसीलदार और SDM पर बरसे

 April 20, 2020
ठियोग के सीपीआईएम विधायक राकेश सिंघा ने आज एसडीएम शिमला के कार्यालय के बाहर धरना दे दिया। उनका प्रशासन पर आरोप है की शिमला में फंसे मज़दूरों को राशन मुहैया नहीं करवाया जा रहा है। शिमला में 20 से 25 हज़ार मज़दूर हैं जिनको खाना नहीं मिल रहा है। जबकि प्रशासन 1200 मज़दूरों की लिस्ट लेकर घूम रहा है। इस दौरान उनको एसडीएम ऑफिस के तहसीलदार के साथ कहासुनी भी हो गई। एसडीएम शिमला को भी सिंघा ने खूब खरी खोटी सुनाई और एसडीएम पर खूब बरसे।

सिंघा का आरोप है कि मज़दूरों को प्रशासन राशन नहीं दे पा रहा है। उनको हर दिन मज़दूरों के फोन आ रहे हैं। मजबूरन उन्हें धरने पर बैठना पड़ा जब तक शिमला के सभी मज़दूरों को राशन नही मिल जाता है तब तक वह यहां बैठे रहेंगे। मज़दूरों को यदि उचित खाना नहीं मिलेगा तो वह कारोना की चपेट में सीघ्र आएंगे क्योंकि अच्छा खाना न मिलने से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाएगी। प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है।

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