भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

हिमाचल में दलित अस्मिता का ज्वालामुखी फूटा: 17 नवंबर को उठी आवाज़ अब सिर्फ विरोध नहीं, नया सामाजिक आंदोलन है:--आशीष कुमार

हिमाचल में दलित अस्मिता का ज्वालामुखी फूटा: 17 नवंबर को उठी आवाज़ अब सिर्फ विरोध नहीं, नया सामाजिक आंदोलन है

:--- आशीष कुमार  संयोजक शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश 
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हिमाचल प्रदेश को अक्सर एक शांत, सुरक्षित और प्रगतिशील राज्य के रूप में पेश किया जाता रहा है, लेकिन 17 नवंबर 2025 ने इस छवि की परतें उधेड़ दीं। इस दिन उठी आवाज़ें किसी अचानक गुस्से का परिणाम नहीं थीं, बल्कि दशकों से जमा हुए अपमान, उत्पीड़न और प्रशासनिक बेरुख़ी का फट पड़ा ज्वालामुखी थीं। रोहड़ू में दलित बच्चे सिकंदर की संदिग्ध मौत से लेकर कुल्लू–सैंज की

दलित महिला की निर्मम हत्या तक, हाल की घटनाओं ने यह साफ किया कि हिमाचल की “शांति” दरअसल हाशिये पर धकेले गए समुदायों की चुप्पी पर टिकी हुई थी। इस चुप्पी ने अब विद्रोह का रूप ले लिया है, और यह विद्रोह सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं—बल्कि सामाजिक पुनर्गठन की दिशा में बढ़ता कदम है।
इस राज्यव्यापी प्रदर्शन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता और संगठित रूप था। ये विरोध   किन्नौर   मंडी, रामपुर,, शिमला, बालीचौकी, कुल्लू  , चम्बा,हमीरपुर,  कांगड़ा , पालमपुर में  और सिरमौर   में  पुरे हिमाचल  में  आयोजित  हुए, इन  विरोध प्रदर्शनों में  भागीदारी की  ये संख्याएँ बताती हैं कि यह कोई बिखरी हुई भीड़ नहीं बल्कि वर्ग-सचेत और ठोस नाराज़गी है। छोटे-छोटे गाँवों से निकली ये आवाज़ें अब स्थानीय नहीं रहीं; ये हिमाचल की धरती पर खड़े हर उस व्यक्ति की आवाज़ हैं जिसे न्याय और समानता चाहिए, जिसे संविधान के वादों पर भरोसा है और जो उन्हें जमीन पर लागू होते देखना चाहता है।
इस उभार का मूल कारण यह है कि न्याय की माँग करने वालों को लगातार ठोकरें मिली हैं। दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में पुलिस जांच अक्सर धीमी, पक्षपाती और आधी-अधूरी रहती है। सफाई कर्मचारियों की स्थिति आज भी वही है—अनिश्चित नौकरी, ठेका शोषण, सुरक्षा का अभाव और अमानवीय काम का बोझ। भूमिहीन दलित परिवारों को आज भी जमीन का मालिकाना हक़ एक दूर का सपना लगता है। यह सब मिलकर उस विस्फोटक माहौल को तैयार करता रहा है जो 17 नवंबर को पूरे राज्य में फूट पड़ा।
आंदोलनकारियों की मांगें सिर्फ प्रशासनिक सुधारों की सूची नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के ढाँचे को पुनर्संगठित करने की मांग हैं। SC/ST एक्ट के मामलों की तेज़ जांच, दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी, तेलंगाना की तर्ज पर SC/ST विकास निधि कानून, 85वें संशोधन का पूर्ण लागू होना, सफाई कर्मियों के नियमितीकरण और हिमाचल सफाई आयोग की स्थापना, दलित भूमिहीन परिवारों को भूमि का मालिकाना हक़ और शहरी ढारों का नियमितीकरण—ये सभी मांगें बताती हैं कि यह आंदोलन सिर्फ किसी घटना का विरोध नहीं बल्कि लंबे समय से उपेक्षित अधिकारों की वापसी का संघर्ष है। साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों पर भेदभाव और साम्प्रदायिक हमलों पर रोक की मांग यह स्पष्ट करती है कि यह आंदोलन सामाजिक न्याय की व्यापक लड़ाई का हिस्सा है।
इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसमें सिर्फ दलित समुदाय नहीं बल्कि किसान, मजदूर, छात्र, महिलाएँ, सफाई कर्मचारी, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे। यह एक साझा जनचेतना का उभार था—वर्ग-संघर्ष और सामाजिक संघर्ष का मिलाजुला रूप। शोषण मुक्ति मंच के संयोजक आशीष कुमार ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यह सिर्फ दलित समाज का संघर्ष नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का आंदोलन है।  शोषण मुक्ति मंच  के  बैनर  तले  आए  सभी संगठनों  के पदाधिकारीयों  ने भी सरकार को संकेत दिया कि अब जनता सिर्फ सुनने नहीं बल्कि जवाब लेने के लिए खड़ी है, और अगर सरकार टालमटोल करती रही तो हिमाचल में आंदोलन और संगठित, और तीव्र रूप लेगा।
17 नवंबर की यह गूँज सिर्फ आज की नहीं है—यह हिमाचल के सामाजिक ढाँचे में एक नई दिशा का संकेत है। दलित राजनीति अब हाशिये की राजनीति नहीं रही। यह आंदोलन यह साबित करता है कि हिमाचल में सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने वाली नई सामाजिक चेतना जन्म ले चुकी है। अगर सरकार इस चेतावनी को अनसुना करती है, तो आने वाला समय न सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदलेगा बल्कि सामाजिक न्याय के दायरे को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा। हिमाचल की जनता अब सिर्फ बदलाव चाहती नहीं—वह बदलाव का रास्ता खुद तैयार कर रही है।

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