मजदूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा: श्रम, करुणा और न्याय का प्रश्न* :---- आशीष कुमार

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 *मजदूर दिवस और बुद्ध पूर्णिमा: श्रम, करुणा और न्याय का प्रश्न* :---- आशीष कुमार आशी आज एक ओर पूरी दुनिया मजदूर दिवस मना रही है, तो दूसरी ओर बुद्ध पूर्णिमा भी है। यह संयोग केवल कैलेंडर का नहीं, बल्कि विचारों का है—श्रम और करुणा, न्याय और मानव गरिमा के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है । मजदूर दिवस हमें उन हाथों की संघर्षों की  याद दिलाता है, जिन्होंने दुनिया को गढ़ा है। बुद्ध पूर्णिमा हमें उस चेतना की याद दिलाती है, जिसने मनुष्य को दुःख, असमानता और शोषण के कारणों को समझने और उनसे मुक्ति की दिशा दिखाई। मजदूर दिवस का ऐतिहासिक आधार भारत में पहली बार 1 मई 1923 को मजदूर दिवस मनाया गया था। इसके पीछे पूरी दुनिया में हुए मजदूर आंदोलनों की लंबी श्रृंखला थी, जिसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 1886 का शिकागो आंदोलन रहा, जहाँ 8 घंटे काम के अधिकार के लिए मजदूरों ने संघर्ष किया और अपने जीवन तक बलिदान कर दिए। यह इतिहास बताता है कि श्रम अधिकार कभी दया से नहीं मिले, बल्कि संघर्ष और संगठित शक्ति से प्राप्त हुए हैं। परन्तु  आज का सवाल भी यही है  क्या मजदूर की स्थिति बदली है?  लगभग एक सदी के...

हमीरपुर में महिला पर नाबालिग द्वारा दराती से हमला — पांच दिन बाद PGI में महिला की दर्दनाक मौत

 *हमीरपुर में महिला पर नाबालिग द्वारा दराती से हमला — पांच दिन बाद PGI में महिला की दर्दनाक मौत


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शोषण मुक्ति मंच  राज्य  जिला कमेटी हिमाचल प्रदेश अभी हाल ही  में 

हमीरपुर ज़िले में घटी यह हृदयविदारक घटना प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा पर गम्भीर सवाल खड़े करती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पूर्व एक नाबालिग ने एक महिला पर दराती से जानलेवा हमला किया था, जिसके बाद घायल महिला को गंभीर अवस्था में पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती करवाया गया। पाँच दिन तक जीवन और मृत्यु से संघर्ष करने के बाद महिला ने दम तोड़ दिया। मंच के राज्य  संयोजक आशीष कुमार ओर सह संयोजक राजेश कोष ओर मिंटा जिंटा  ने कहा कि 


शोषण मुक्ति मंच हिमाचल प्रदेश राज्य   कमेटी इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करता है और मांग करता है कि:

. दोषी नाबालिग पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की सीमाओं में रहते हुए कठोरतम कार्रवाई की जाए।

पीड़िता के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता और सुरक्षा दी जाए।

प्रदेश सरकार महिला सुरक्षा के लिए ठोस नीतिगत कदम उठाए, ताकि इस तरह की घटनाएँ दोबारा न हों।


मंच का कहना है कि यह केवल एक व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता और प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम भी है।

हम सबकी जिम्मेदारी है कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाएँ।



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