भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी
14 अप्रैल 1891 को जन्मे और 6 दिसंबर 1956 को महापरिनिर्वाण को प्राप्त बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर का जीवन हमें बराबरी, वैज्ञानिक चेतना और विद्रोही विवेक की वह मशाल देता है, जिसकी रोशनी में किसी भी सभ्य समाज को खुद को परखना चाहिए। पर आज का भारत एक अजीब उलटबाँसी का समय है—यह वह दौर है जब अम्बेडकर को मानना आसान है, पर अम्बेडकर को समझना और अपनाना लगभग अपराध जैसा बना दिया गया है। यही कारण है कि पूरे साल संघ और उसके सहयोगियों ने अम्बेडकर को नये सिरे से परिभाषित करने का एक संगठित अभियान चलाया—उन्हें जाति-उन्मूलन के बजाय “सामाजिक समायोजन” का विचारक बताना, आरक्षण को ‘सीमा’ में बाँधने की माँग करना, और संविधान को ‘अधिक स्वतंत्र’ घोषित करना इसी परियोजना के हिस्से थे।
आज संविधान लागू होने के बाद वी. एन. राव या अम्बेडकर जैसी बहस को जन्म देना एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है, वी.एन. राव जैसे चेहरों को सामने लाकर यह दावा करने की कोशिश करना संविधान का निर्माण अम्बेडकर ने नहीं बल्कि वी एन राव ने किया, अगर ये अफवाह न हो तो एक दलित व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता को स्वीकार करना पड़ेगा, एक दलित जो गंदगी साफ कर सकता है वो संविधान को कैसे लिख सकता है और वो भी वो किताब जिसके आधार मान कर सबको चलना पड़ेगा यही कारण है की संघ की कुछ लोगों ने इस बहस को जन्म दिया और ये कहना कि अम्बेडकर जाति के विरुद्ध नहीं, सिर्फ सामाजिक सामंजस्य के पक्षधर थे; परन्तु यह वही अम्बेडकर हैं जिन्होंने कहा था कि ऊँची जातियाँ बराबरी की हर माँग को “अत्यधिक” बताकर ही कमजोर करती हैं। आज वही चेतावनी आज 2025 में भी हक़ीक़त बनकर सामने खड़ी है—संविधान की मूल संरचना पर सवाल, संघीय ढाँचे का क्षरण, न्यायपालिका को नियंत्रित करने की कोशिश, और असहमति को अपराध की तरह पेश करना इसी दिशा की कड़ियाँ हैं। ये सब जानते है की संविधान के लागू होने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने शुरुआती दौर में भारतीय संविधान का विरोध किया था क्योंकि यह 'मनुस्मृति' के सिद्धांतों पर आधारित नहीं था और इसमें धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकारों व सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, महिलाओं को बराबरी जैसे प्रावधान थे, जिनका संघ ने समर्थन नहीं किया; वे संविधान की जगह 'मनु के कानून' चाहते थे और बाद में भी धर्म-आधारित आरक्षण, अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण और संविधान की भावना के विपरीत नीतियों की आलोचना करते रहे हैं, हालांकि "दा हिन्दू" की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में संघ का कहना है कि वे संविधान की भावना का
आज के दौर का एक और कटु सच यह है कि अम्बेडकर के नाम पर जाति-आधारित सामाजिक संगठनों और ऑनलाइन समुदायों ने पहचान की राजनीति को उस रूप में बढ़ाया है जहाँ जाति का प्रदर्शन, श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा और “हमारी जाति सबसे श्रेष्ठ ” जैसे नारे खुलेआम मनुवादी व्यवस्था को ही नई उर्चा और पोषण देते हैं। विडंबना यह है कि जिस अम्बेडकर ने जाति के विनाश की बात कही थी और कहा था—“जाति न रहेगी, तभी राष्ट्र बनेगा”— आज उन्ही के नाम पर जाति को ढाल बनाकर नई सामाजिक खाइयाँ तैयार की जा रही हैं।
मौजूदा समय में भगत सिंह और सावरकर के विचारों की चर्चा करनी भी जरुरी है , यंहा भगत सिंह और सावरकर के विचारों में अंतर देखिये —जहाँ भगत सिंह जाति–आधारित समाज को नेस्तनाबूद करके समानता पर आधारित नया समाज बनाना चाहते थे, वहीं सावरकर जाति को “राष्ट्र की रक्त–शुद्धता” की रक्षा–दीवार बताते रहे। RSS ने इसी दीवार को ‘सांस्कृतिक आधार’ बताकर संरक्षित करने का प्रयास किया। यह वही कड़वी विडंबना है कि जिन शक्तियों ने 1956 से अब तक अम्बेडकर की चेतावनियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया, वे आज उनके स्मारकों और जयंती–समारोहों पर रिकॉर्ड भीड़ लगाती हैं, पर संविधान को कमजोर करने के राजनैतिक अभियान को भी समान गति से चलाती हैं। जो दलित संगठन जो संघ की रास्ते पर चल रहे है और इस भ्रम में है कि कुछ लोग ये झूठ फैला रहे है कि संविधान खतरे में है, उन दलित आरएसएस समर्थकों को ये समझना जरुरी है कि संविधान को ख़त्म करने की औपचारिक घोषणा होने की बाद अगर लड़ने का इंतजार कर रहे हो तो ऐसा समय कभी नहीं आने वाला, क्यूंकि संघ संविधान दिवस, और अम्बेडकर जयंती और महापरनिर्वान पर भारी भरकम भीड़ दिखा कर, पिछले दरवाजे से एक एक करके प्रावधानों को खत्म करती रहेगी, आज सरकारी नौकरी ना होना भर्तियों का स्वरूप बदल कर ये एक आरक्षण खत्म करना ही तो है, आज हमको ये भी देखना है कि जब दलित वर्ग पर अत्याचार होते है तो सड़कों पर कौन आंदोलन करता है और कौन सी ताकते दलित वर्ग के समर्थन में ख़डी होती है, इसी दौरान, जब भी कभी दलितों, आदिवासियों, मज़दूरों और वंचितों पर अत्याचार हुए—कैंपसों में, थानों में, खेतों में या सड़क पर—तो न्याय और प्रतिरोध की आवाज वही वामपंथी और प्रगतिशील ताकतें उठाती दिखीं, जिनके लिए शोषण के खिलाफ लड़ाई जाति की सीमाओं से कहीं बड़ी है। अम्बेडकर स्वयं भी यही चाहते थे—सामाजिक न्याय की लड़ाई पहचान की संकीर्ण दीवारों से निकलकर वर्गीय और मानवीय संघर्ष का रूप ले।
आज, 6 दिसंबर की यह तिथि हमें याद दिलाती है कि अम्बेडकर की पूजा से अधिक उनके विचारों का अनुकरण आवश्यक है। 14 अप्रैल का जन्मदिन हमें बताता है कि तर्क और विद्रोह कभी समाप्त नहीं होते, और 6 दिसंबर का महापरिनिर्वाण हमें चेताता है कि अगर हमने उनकी चेतावनियों—भक्ति को लोकतंत्र का शत्रु मानना, असमानता को राष्ट्र का ज़हर समझना और सामाजिक न्याय को लोकतंत्र की शर्त कहना—नहीं समझी, तो आने वाला समय न हमारे वर्तमान को माफ़ करेगा और न अतीत का सम्मान करेगा।
इसलिए आज बाबा साहब अम्बेडकर को सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम जातीय चेतना को त्याग कर वैज्ञानिक–वर्गीय चेतना को विकसित करें, और संविधान के हर अनुच्छेद की रक्षा को व्यक्तिगत–राजनीतिक संकल्प बनाएं। क्योंकि 1891 से 1956 तक अम्बेडकर का पूरा संघर्ष इसी सत्य पर टिका था—भारत पूजा से नहीं, समझ और परिवर्तन से बनेगा।
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