बजट में घोषित 1,000 रुपए मासिक वेतन वृद्धि छह माह बाद भी लागू नहीं होने पर आंगनबाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स के 23 अक्तूबर को प्रदेशव्यापी प्रदर्शन

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बजट में घोषित 1,000 रुपए मासिक वेतन वृद्धि छह माह बाद भी लागू नहीं होने पर आंगनबाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स के 23 अक्तूबर को प्रदेशव्यापी प्रदर्शन 1-2 दिसंबर को दिल्ली महापड़ाव में हिमाचल से जाएंगे 1,000 आंगनबाड़ी कर्मी ______________________________________ आंगनबाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स यूनियन संबंधित सीटू हिमाचल प्रदेश राज्य कमेटी की बैठक आज कॉमरेड ज्योति बासु भवन, हमीरपुर में यूनियन की प्रदेशाध्यक्ष नीलम जसवाल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में आंगनबाड़ी कर्मियों की लंबित मांगों, प्रदेश सरकार द्वारा बजट में की गई घोषणाओं को लागू करने, 8 जून को शिमला में किए गए प्रदर्शन तथा 20 अगस्त 2026 को निदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग को सौंपे गए मांग-पत्र पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक को सीटू राष्ट्रीय सचिव डॉ. कश्मीर ठाकुर, सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, यूनियन अध्यक्ष नीलम जसवाल व महासचिव वीना शर्मा ने संबोधित किया। बैठक में सुदेश ठाकुर, जोगिन्द्र कुमार, गोबिंद भंडारी, चंपा, बिमला, सुदर्शना, शशि, लजया देवी, वीना, रीता, किरण, सुरमा, बिमला ठाकुर, स्वर्चा देवी, इंदु, सुषमा, बबली, चंपा, ...

धर्म नहीं, सामाजिक न्याय आधार—आरक्षण पर फैसले पर पुनर्विचार जरूरी*

 *धर्म नहीं, सामाजिक न्याय आधार—आरक्षण पर फैसले पर पुनर्विचार जरूरी*




शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश

शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश के राज्य संयोजक आशीष कुमार तथा सह संयोजक राजेश कोष और मिन्ता जिंटा ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर गहरी चिंता जताई है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना लेता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जाएगा।

उन्होंने कहा कि आरक्षण का सवाल किसी धर्म से नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक उत्पीड़न और आर्थिक शोषण से जुड़ा हुआ है। शोषण मुक्ति मंच ये  स्पष्ट रूप से मानता है कि समाज में मौजूद वर्गीय और जातिगत असमानताओं को खत्म किए बिना वास्तविक बराबरी संभव नहीं है।

नेताओं ने कहा कि धर्म परिवर्तन से किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और उस पर होने वाला भेदभाव खत्म नहीं हो जाता। ऐसे में इस आधार पर आरक्षण से वंचित करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह संविधान में निहित सामाजिक न्याय और समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ भी है।

उन्होंने मांग की कि इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए और इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाए, ताकि शोषित और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।


— शोषण मुक्ति मंच, हिमाचल प्रदेश

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