जब बराबरी खटकने लगे ,तो आरक्षण निशाने पर क्यों ?*
*जब बराबरी खटकने लगे ,तो आरक्षण निशाने पर क्यों ?*
— आशीष कुमार ‘आशी’
आरक्षण को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज है। आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन हो रहे हैं। इस आंदोलन में शामिल युवाओं की बेचैनी को समझना भी जरूरी है। आखिर जब एक गरीब परिवार का बच्चा महंगी शिक्षा, कोचिंग और प्रतियोगिता की दौड़ में पीछे रह जाता है, तो उसके मन में व्यवस्था को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन हमें एक सवाल ईमानदारी से खुद से पूछना होगा ,क्या इस समस्या का समाधान किसी दूसरे गरीब के हिस्से का अधिकार कम करने में है? मेरे विचार से इसका जवाब साफ है—नहीं।
एक गरीब परिवार का बच्चा चाहे किसी भी जाति से हो, उसकी परेशानी वास्तविक है। जिसके घर में दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो, उसके लिए महंगी शिक्षा और कोचिंग किसी पहाड़ से कम नहीं। इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा, छात्रवृत्ति, कोचिंग और रोजगार के विशेष अवसर बढ़ाए जाने चाहिए। लेकिन यहां एक बुनियादी बात समझना जरूरी है—आरक्षण केवल गरीबी दूर करने की योजना नहीं है। भारत में जाति केवल आर्थिक स्थिति का नाम नहीं रही। सदियों तक दलितों और अन्य वंचित समुदायों को शिक्षा, सम्मान, संसाधनों, रोजगार और सत्ता की संरचनाओं से दूर रखा गया। सामाजिक भेदभाव की यह विरासत केवल आर्थिक स्थिति बदल जाने से समाप्त नहीं हो जाती। इसीलिए सामाजिक पिछड़ेपन और आर्थिक गरीबी को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। हमें अपने भीतर की मानसिकता पर भी सवाल उठाना होगा, आरक्षण के विरोध की चर्चा करते हुए समाज के उस हिस्से की मानसिकता पर भी विचार करना जरूरी है, जिसे शायद आज भी यह स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि जिस व्यक्ति या समुदाय को कभी बराबरी का अधिकार नहीं दिया गया, वह आज शिक्षा, नौकरी और सत्ता में अपने हिस्से की जगह मांग रहा है।अगर किसी के मन में यह पीड़ा है कि “जो कल तक हमारे सामने झुककर खड़ा था, वह आज हमारे बराबर कैसे खड़ा हो गया?”—तो हमें यह समझना होगा कि यह आरक्षण की समस्या नहीं, बल्कि बराबरी को स्वीकार न कर पाने की मानसिकता है। जिस दलित समाज को सदियों तक दबाया गया, जिसके श्रम का इस्तेमाल तो किया गया लेकिन जिसे सम्मान और अवसर से वंचित रखा गया, आज अगर उसका कोई बच्चा पढ़-लिखकर नौकरी हासिल करता है, अधिकारी बनता है या समाज में सम्मान के साथ खड़ा होता है, तो इसे किसी के लिए पीड़ा का कारण नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की निशानी होना चाहिए। आरक्षण से मिलने वाला लाभ भले ही हर व्यक्ति तक समान रूप से न पहुंचा हो, लेकिन जिस व्यक्ति के लिए पीढ़ियों से बंद दरवाजा पहली बार खुलता है, उसके लिए वह अवसर बहुत मायने रखता है। बराबरी का मतलब यह नहीं कि जो ऊपर है उसे नीचे खींच दिया जाए; बराबरी का मतलब है कि जो नीचे दबा रहा, उसे ऊपर उठने का अवसर मिले। गरीबों की लड़ाई की दिशा बदलनी होगी मेरा सवाल उन युवाओं से भी है जो आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं—क्या आपकी असली समस्या किसी गरीब दलित या पिछड़े परिवार का बच्चा है? क्या आपकी समस्या वह मजदूर है जिसका बच्चा भी आपके बच्चे की तरह नौकरी का सपना देखता है? या असली समस्या यह है कि नौकरियां कम हैं, सरकारी पद खाली पड़े हैं, शिक्षा महंगी होती जा रही है और प्रतियोगिता लगातार कठिन होती जा रही है? अगर समस्या यही है तो संघर्ष भी इन्हीं सवालों पर होना चाहिए। सरकारी नौकरियां बढ़ाओ।
खाली पद भरो। सरकारी स्कूल और कॉलेज मजबूत करो।गरीब बच्चों को मुफ्त या सस्ती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दो। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए गरीबों को सहायता दो।
गरीब युवाओं को आरक्षण के नाम पर एक-दूसरे के सामने खड़ा करने से किसी का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।
एक गरीब सामान्य वर्ग का युवा हमारा दुश्मन नहीं है। एक गरीब दलित युवा भी किसी का दुश्मन नहीं है। एक गरीब आदिवासी और पिछड़ा युवा भी किसी का दुश्मन नहीं है।
इन सबकी लड़ाई का बड़ा हिस्सा एक ही है—शिक्षा, रोजगार, सम्मान और बेहतर भविष्य की लड़ाई। इसलिए आर्थिक रूप से कमजोर हर परिवार के लिए सहायता का दायरा बढ़ना चाहिए। लेकिन इसे SC, ST और OBC के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। हमें ऐसा समाज बनाना है जहां किसी बच्चे को सिर्फ इसलिए पीछे न रहना पड़े कि उसके माता-पिता गरीब हैं और न ही किसी बच्चे को जाति के कारण भेदभाव सहना पड़े। सवाल आरक्षण का नहीं, अवसरों की कमी का भी है आज हमें यह सवाल सरकार से पूछना चाहिए कि जब देश में करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में हैं तो पर्याप्त सरकारी नौकरियां क्यों नहीं हैं? जब शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा इतनी महंगी क्यों होती जा रही है? जब गरीब परिवार का बच्चा प्रतियोगी परीक्षा देना चाहता है तो उसे कोचिंग और तैयारी के लिए लाखों रुपये खर्च करने की मजबूरी क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल गरीबों को आपस में लड़ाने के बजाय सरकार शिक्षा और रोजगार के अवसर क्यों नहीं बढ़ाती? यही वह जगह है जहां हमारी लड़ाई की दिशा तय होती है। हमारी लड़ाई किसी जाति के गरीब के खिलाफ नहीं है। हमारी लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें पैसा अवसरों को आसान बनाता है और गरीबी सपनों के रास्ते में ये पैसा दीवार बन जाता है। मैं चाहता हूं कि खेत में मजदूरी करने वाले का बच्चा भी डॉक्टर बने। किसान का बच्चा भी इंजीनियर बने। गरीब परिवार का बच्चा भी अधिकारी बने। और किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति या उसकी जाति के कारण सीमित न हो। लेकिन इसके लिए किसी का अधिकार छीनना नहीं, अवसरों का विस्तार करना होगा। आरक्षण को लेकर मतभेद हो सकते हैं। नीतियों पर बहस हो सकती है। आरक्षण की व्यवस्था में सुधार पर भी चर्चा हो सकती है। लेकिन इस बहस को ऐसी लड़ाई में बदल देना, जिसमें गरीब को गरीब के खिलाफ खड़ा कर दिया जाए, समाज के लिए खतरनाक है।हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों के लिए कैसा समाज छोड़कर जाना चाहते हैं—वह समाज जिसमें गरीब अपने ही गरीब भाई से लड़ता रहे, या वह समाज जिसमें हर बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिले? जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। गरीब बनाम गरीब नहीं। दलित बनाम सामान्य नहीं। पिछड़ा बनाम अगड़ा नहीं।लड़ाई हो—गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, भेदभाव और शोषण के खिलाफ। क्योंकि बराबरी किसी का अधिकार छीनने का नाम नहीं है।
बराबरी उस इंसान को भी सिर उठाकर चलने का अधिकार देने का नाम है, जिसे सदियों तक झुकाकर रखा गया। और अगर हम सचमुच एक बेहतर समाज चाहते हैं, तो हमें गरीबों को बांटना नहीं—उन्हें एकजुट करना होगा।

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