भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे ठोस और क्रूर हक़ीक़त :-- आशीष कुमार आशी

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*भेदभाव कल्पना नहीं,बल्कि आज की सबसे  ठोस और क्रूर  हक़ीक़त है*                        (आशीष कुमार आशी ) यूजीसी रेगुलेशन 2026 को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम उससे पहले देश में घटित हुए उन घटनाक्रमों को अपने ज़हन में रखें, जिनसे यह साफ़ होता है कि जातिगत भेदभाव आज भी हमारी सामाजिक और शैक्षणिक संरचनाओं में गहराई से मौजूद है। जब भी आरक्षण पर सवाल उठाए जाएँ, दलित वर्ग की योग्यता पर संदेह किया जाए, या यह पूछा जाए कि “आरक्षण कब तक?”, तब अपने अंतर्मन में कुछ घटनाओं को ज़रूर स्मरण कर लेना चाहिए—पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई पर जूता फेंके जाने की घटना, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ हुआ सार्वजनिक अपमान। ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं हैं; इनके अनगिनत उदाहरण देश के सामाजिक इतिहास में बिखरे पड़े हैं। हम ये नहीं कहते की ugc  रेगुलेशन 2026 में कोई  कमी  नहीं  है, इसमें खामियाँ  हो सकती है, मगर ये पिछले 2012 की रेगुलेशन से बेहतर था  इसकी  आवश्यकता  इसलिए भी  थी क्यूंकि  2012 का रेग...

मेरी लड़ाई तो अंधेरे से है= = पंकज तन्हा

इस देश मे मूर्खों की कमी नहीं.. न भी ढूंढो तो हजारों मिलते हैं..।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी इस देश की जनता से आपातकाल में सेवा दे रहे लोगों की हौंसला अफजाई के लिए

घर  के दरवाजे पर खड़े होकर थाली बजाने औऱ दीपक या मोमबत्ती जलाने का आह्वान करते हैं।

उनका मकसद केवल इतना रहता है कि आपातकाल में दिन रात सेवा दे रहे लोगों को महसूस हो कि इस देश के लोगों को उनपर गर्व है वो भी उनके साथ हैं।

 लेकिन मूर्खों की जमात उनके इस प्रयास पर तब पानी फेर देती है जब

मूर्ख अपने अपने तर्क देने लगते हैं

कोई कहता है थाली बजाने से उत्पन्न हुई तरंगों से कीटाणु मर जाएंगे। कोई नासा का तो कोई धर्म ग्रंथो का उदाहरण देने लगता है। कोई बताता है कि एक मोमबत्ती या दीपक कितनी ऊर्जा पैदा करता है। इस ऊर्जा से क्या होगा।

औऱ भी न जाने क्या क्या..?

इन मूर्खो की जमात के कारण कुछ हो न हो लेकिन प्रधानमंत्री जो सोच लेकर आये हैं उसपर वह पानी जरूर फेर देते हैं।

उनका मख़ौल बना कर छोड़ देते हैं।

 धन्य है ये जमात

मेरी लड़ाई तो अंधेरों से है
हवा तो बेवजह ही मेरे खिलाफ है

शब्द तलवार है

पंकज तन्हा

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